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वॉशिंगटन: बिना बच्चों वाले डे-केयर केंद्रों को मिल रही भारी सब्सिडी, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल

ICN24 Newsroom 7 जुल॰ 2026, 03:31 am
वॉशिंगटन: बिना बच्चों वाले डे-केयर केंद्रों को मिल रही भारी सब्सिडी, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल

वॉशिंगटन में एक जांच में सामने आया है कि राज्य सरकार उन डे-केयर केंद्रों को लाखों डॉलर की सब्सिडी दे रही है जहाँ एक भी बच्चा नहीं है।

अमेरिका के वॉशिंगटन राज्य से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ सरकारी खजाने से उन डे-केयर (डे-केयर) केंद्रों को भारी सब्सिडी दी जा रही है, जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं हैं या जहाँ एक भी बच्चा नहीं पढ़ रहा है। 'द सेंटर स्क्वायर' द्वारा की गई एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, राज्य प्रशासन उन संस्थानों को करदाताओं का पैसा बांट रहा है जिनके बारे में मीडिया पहले ही चेतावनी दे चुका था। यह मामला न केवल वित्तीय अनियमितता का है, बल्कि सरकारी तंत्र की जवाबदेही पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। जांच में पाया गया कि कई डे-केयर केंद्र ऐसे हैं जिन्हें प्रतिवर्ष लाखों डॉलर की सब्सिडी प्राप्त हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम एक ऐसा पता मिला जो आधिकारिक दस्तावेजों में डे-केयर के रूप में पंजीकृत था, लेकिन वहां रहने वाले निवासियों ने बताया कि वहां कोई डे-केयर केंद्र संचालित नहीं हो रहा है। इसके बावजूद, उस पते पर हजारों-लाखों डॉलर भेजे गए। मीडिया रिपोर्टों और सबूतों के बावजूद, वॉशिंगटन राज्य के अधिकारियों ने इन केंद्रों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और न ही कोई गहन जांच शुरू की। इस मामले ने प्रवासी समुदायों, विशेष रूप से भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के बीच भी चर्चा छेड़ दी है। ऑस्ट्रेलिया में भी भारतीय मूल के हजारों परिवार सरकार द्वारा दी जाने वाली 'चाइल्ड केयर सब्सिडी' (CCS) पर निर्भर हैं। ऑस्ट्रेलिया का शिक्षा विभाग और मानव सेवा विभाग (Services Australia) इस तरह की धोखाधड़ी को रोकने के लिए कड़े नियम लागू करता है। वॉशिंगटन की इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि निगरानी तंत्र में ढील दी जाए, तो सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किस स्तर तक हो सकता है। भारतीय समुदाय के लोग, जो अक्सर सामुदायिक और विश्वसनीय डे-केयर सेवाओं को प्राथमिकता देते हैं, इस खबर को पारदर्शिता की कमी के एक बड़े उदाहरण के रूप में देख रहे हैं। राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि राज्य सरकार ने जानबूझकर इन 'घोस्ट डे-केयर्स' की अनदेखी की। करदाताओं के पैसे का उपयोग परिवारों की मदद के बजाय संदिग्ध संस्थानों को समृद्ध करने के लिए किया जा रहा है। स्थानीय प्रशासन का तर्क है कि वे नियमों के तहत काम कर रहे हैं, लेकिन रिकॉर्ड्स में दर्ज विसंगतियां कुछ और ही कहानी बयां करती हैं। कुल मिलाकर, वॉशिंगटन का यह घोटाला दुनिया भर के विकसित देशों के लिए एक सबक है। सार्वजनिक धन के आवंटन में पारदर्शिता और नियमित ऑडिट की कमी न केवल अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाती है, बल्कि उन वास्तविक परिवारों के हक को भी मारती है जिन्हें सहायता की सख्त जरूरत होती है। ICN24 की टीम इस मामले पर नजर बनाए हुए है कि क्या आने वाले समय में राज्य के अधिकारी अपनी गलती सुधारते हुए इन केंद्रों पर कार्रवाई करेंगे।
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