राजनीति
ताइवान की सेना ने शुरू की ‘कम्युनिस्ट विरोधी’ कक्षाएं, चीन से बढ़ते खतरे को बताया मुख्य कारण
ICN24 Newsroom 5 जुल॰ 2026, 05:31 pm

चीन के बढ़ते सैन्य दबाव के बीच ताइवान ने अपने सैन्य स्नातकों के लिए ‘कम्युनिस्ट विरोधी’ प्रशिक्षण फिर से शुरू किया है, जिसका उद्देश्य मनोवैज्ञानिक तैयारी को मजबूत करना है।
ताइपे: ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव के तहत अपने सैन्य अकादमी के स्नातकों के लिए ‘कम्युनिस्ट विरोधी’ वैचारिक कक्षाओं को फिर से अनिवार्य कर दिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब ताइवान जलडमरूमध्य में बीजिंग की सैन्य गतिविधियों और घुसपैठ में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। ताइवानी सैन्य अधिकारियों का मानना है कि केवल भौतिक सुरक्षा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सैनिकों को वैचारिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी चीन के प्रभाव से बचाने की आवश्यकता है।
सैन्य अधिकारियों द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इन विशेष कक्षाओं का उद्देश्य सैनिकों के बीच चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की कार्यप्रणाली, उनकी प्रोपोगंडा मशीनरी और ताइवान के खिलाफ उनके 'ग्रे-ज़ोन' युद्ध कौशल के प्रति जागरूकता पैदा करना है। दशकों पहले, ताइवान में इस तरह का प्रशिक्षण अनिवार्य था, लेकिन चीन के साथ संबंधों में सुधार और लोकतांत्रिक सुधारों के दौर में इसे धीरे-धीरे कम या बंद कर दिया गया था। अब, बदलती वैश्विक भू-राजनीति ने ताइवान को अपनी पुरानी रणनीति पर लौटने के लिए मजबूर कर दिया है।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह घटनाक्रम काफी मायने रखता है। ऑस्ट्रेलिया और भारत, दोनों ही 'क्वाड' (Quad) के महत्वपूर्ण सदस्य हैं और क्षेत्र में शांति व स्थिरता बनाए रखने के साझा लक्ष्य की दिशा में काम कर रहे हैं। ताइवान में बढ़ता तनाव न केवल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (जैसे कि सेमीकंडक्टर उद्योग) को प्रभावित कर सकता है, बल्कि यह हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र में सैन्य संतुलन को भी बिगाड़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया की रणनीतिक नीति भी चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर सतर्क रही है, जिससे इस खबर की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।
ताइवान के रक्षा मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि यह प्रशिक्षण किसी के प्रति घृणा फैलाने के लिए नहीं, बल्कि अपने लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सैनिकों को यह समझना होगा कि वे किन मूल्यों के लिए लड़ रहे हैं। बीजिंग द्वारा ताइवान को अपना हिस्सा बताए जाने और ज़रूरत पड़ने पर बल प्रयोग की धमकी देने के बाद, ताइपे अपनी रक्षा क्षमताओं को आधुनिक बनाने के साथ-साथ सैनिकों के मानसिक मनोबल पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ताइवान का यह कदम चीन के उस दावों का जवाब है जिसमें वह ताइवान के लोगों को सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से मुख्य भूमि चीन से जोड़ने की कोशिश करता है। आने वाले समय में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से नई दिल्ली और कैनबरा, इस वैचारिक पुनरुद्धार को किस दृष्टि से देखते हैं। ताइवान की सुरक्षा अब केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिरता का एक प्रमुख स्तंभ बन गई है।
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