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डिजिटल चमक और विभागीय दफ्तर: शहडोल के 'वायरल' पुलिसकर्मी विवेकानंद तिवारी की कहानी

ICN24 Newsroom 5 जुल॰ 2026, 10:31 am
डिजिटल चमक और विभागीय दफ्तर: शहडोल के 'वायरल' पुलिसकर्मी विवेकानंद तिवारी की कहानी

शहडोल के ट्रैफिक पुलिसकर्मी विवेकानंद तिवारी अपनी रील्स और सोशल मीडिया से होने वाली मोटी कमाई के कारण अब विभागीय जांच के घेरे में हैं।

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मी विवेकानंद तिवारी इन दिनों अपनी वर्दी से ज्यादा अपनी 'रील्स' के लिए चर्चा में हैं। ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूकता फैलाने और मोटिवेशनल वीडियो बनाने के उद्देश्य से शुरू हुआ उनका सोशल मीडिया सफर अब उन्हें एक ऐसे मोड़ पर ले आया है, जहां उनकी लोकप्रियता ही उनके लिए मुसीबत बनती नजर आ रही है। विवेकानंद तिवारी के सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स हैं, और उनकी पहुंच केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। तिवारी के वीडियो अक्सर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर वायरल होते हैं, जिनमें वे जनता को ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूक करते हुए या जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की सलाह देते दिखाई देते हैं। हालांकि, इस डिजिटल प्रसिद्धि के साथ-साथ उनके आर्थिक पक्ष में भी बड़ा बदलाव आया है। रिपोर्टों के अनुसार, विवेकानंद तिवारी को अपने सोशल मीडिया चैनलों से होने वाली आय उनकी पुलिस की मासिक तनख्वाह से कहीं अधिक है। यही वह बिंदु है जिसने पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। पुलिस विभाग के सेवा नियमों के अनुसार, किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिए निजी तौर पर लाभ अर्जित करना या किसी अन्य व्यवसाय में शामिल होना बिना पूर्व अनुमति के प्रतिबंधित होता है। विवेकानंद तिवारी की बढ़ती डिजिटल कमाई और ड्यूटी के घंटों के दौरान या वर्दी में वीडियो बनाने की गतिविधि ने अनुशासन के सवाल खड़े कर दिए हैं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि पुलिसकर्मी की ऑनलाइन गतिविधियों की अब गहन समीक्षा की जा रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कहीं उनकी 'इन्फ्लुएंसर' छवि उनके आधिकारिक कर्तव्यों में बाधा तो नहीं बन रही है। यह मामला भारत में सार्वजनिक सेवा में लगे व्यक्तियों और सोशल मीडिया के बीच के जटिल संबंध को दर्शाता है। हाल के वर्षों में कई पुलिस अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर जनता के बीच अपनी पैठ बनाई है। लेकिन सवाल हमेशा यही उठता है कि लोकप्रियता और व्यावसायिक लाभ की यह दौड़ सरकारी गरिमा और सेवा शर्तों के बीच कहां ठहरती है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी यह एक दिलचस्प केस स्टडी है। यहाँ भी सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों के लिए सोशल मीडिया कोड ऑफ कंडक्ट अत्यंत सख्त हैं। डिजिटल युग में 'पब्लिक सर्वेंट' और 'पब्लिक फिगर' के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। विवेकानंद तिवारी का मामला यह स्पष्ट करता है कि जब 'फील्ड' की ड्यूटी 'फीड' की लोकप्रियता के पीछे छूटने लगती है, तो विभागीय कार्रवाई का सामना करना अनिवार्य हो जाता है। फिलहाल, तिवारी की वायरल रील्स उनके करियर के लिए वरदान साबित होंगी या बोझ, यह आने वाली जांच तय करेगी।
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