राजनीति
नीति आयोग का ग्राम सभाओं में कम भागीदारी पर राष्ट्रीय अध्ययन: जमीनी लोकतंत्र को मजबूत करने की बड़ी पहल
ICN24 Newsroom 5 जुल॰ 2026, 04:31 pm

नीति आयोग ग्राम सभाओं में नागरिकों की कम भागीदारी के कारणों पर एक विस्तृत अध्ययन जारी करने वाला है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण स्वशासन को और अधिक प्रभावी बनाना है।
भारत सरकार के शीर्ष नीतिगत थिंक टैंक, नीति आयोग ने देश भर की ग्राम सभाओं में नागरिकों की कम उपस्थिति और घटती भागीदारी पर एक विस्तृत राष्ट्रीय अध्ययन जारी करने की तैयारी पूरी कर ली है। यह अध्ययन भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला माने जाने वाले पंचायती राज संस्थानों की प्रभावशीलता को लेकर गंभीर सवाल उठाता है। रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य उन सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक बाधाओं की पहचान करना है जो ग्रामीणों को स्थानीय निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रख रही हैं।
ग्राम सभा, जिसे अक्सर 'गांव की संसद' कहा जाता है, प्रत्यक्ष लोकतंत्र का सबसे सशक्त माध्यम है। 73वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार, ग्राम सभा को विकास योजनाओं के चयन, लाभार्थियों की पहचान और सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि कई राज्यों में ये बैठकें केवल कागजों तक सीमित रह गई हैं या इनमें केवल गिने-चुने प्रभावशाली लोग ही शामिल होते हैं। नीति आयोग का यह अध्ययन इन विसंगतियों को दूर करने के लिए ठोस सिफारिशें पेश करेगा।
इस अध्ययन की प्रासंगिकता ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में बसे कई प्रवासी भारतीय (NRIs) आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं और अपने पैतृक गांवों में बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य परियोजनाओं में निवेश करते हैं। जब ग्राम सभाएं सक्रिय और पारदर्शी होती हैं, तो प्रवासियों द्वारा भेजे गए धन और संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित होता है। ग्रामीण प्रशासन में सुधार से विदेशों में बैठे निवेशकों और दानदाताओं का स्थानीय प्रणालियों पर भरोसा बढ़ता है।
रिपोर्ट के प्रारंभिक निष्कर्षों के अनुसार, भागीदारी कम होने के प्रमुख कारणों में जागरूकता का अभाव, बैठकों के समय की अनुपयुक्तता और यह धारणा शामिल है कि उनके सुझावों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। इसके अलावा, महिलाओं और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की भागीदारी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। नीति आयोग का सुझाव है कि तकनीक का उपयोग कर बैठकों की सूचना दी जाए और बैठकों के एजेंडे को अधिक समावेशी बनाया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो ग्रामीण शासन प्रणाली को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना अनिवार्य है। नीति आयोग की यह पहल न केवल समस्याओं को उजागर करेगी, बल्कि राज्यों के बीच 'बेस्ट प्रैक्टिसेज' को साझा करने के लिए एक मंच भी प्रदान करेगी। यह अध्ययन आने वाले समय में ग्रामीण विकास की नीतियों और पंचायती राज बजट के आवंटन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
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