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'साथ कुछ न जाएगा': नेत्रदान के अंधविश्वास को चुनौती देने वाली वह फिल्म जिसने जीता था नेशनल अवार्ड

ICN24 Newsroom 14 अग॰ 2026, 03:37 am
'साथ कुछ न जाएगा': नेत्रदान के अंधविश्वास को चुनौती देने वाली वह फिल्म जिसने जीता था नेशनल अवार्ड

1972 में धीरू मिस्त्री की फिल्म 'साथ कुछ न जाएगा' ने नेत्रदान से जुड़े गहरे सामाजिक अंधविश्वासों पर प्रहार किया और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।

आज के दौर में अंगदान और नेत्रदान को एक महान कार्य माना जाता है, लेकिन पांच दशक पहले भारत में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत थी। 1970 के दशक में, जब नेत्रदान के बारे में बात करना भी एक सामाजिक वर्जना (taboo) माना जाता था, तब वडोदरा के एक दूरदर्शी फिल्म निर्माता धीरू मिस्त्री ने समाज की सबसे गहरी मान्यताओं और डर को चुनौती देने का साहस किया। उनकी 17 मिनट की लघु फिल्म 'साथ कुछ न जाएगा' ने न केवल लोगों की सोच बदली, बल्कि इसे राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया। 1972 में बनी यह फिल्म उस समय के भारतीय समाज में व्याप्त एक बड़े डर को संबोधित करती थी। उस दौर में यह माना जाता था कि यदि कोई व्यक्ति अपनी आंखें दान करता है, तो वह अपने अगले जन्म में अंधा पैदा होगा। इस धार्मिक और पौराणिक अंधविश्वास के कारण लोग नेत्रदान से कतराते थे। मिस्त्री की फिल्म ने इसी भ्रांति पर प्रहार किया और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया। फिल्म का संदेश साफ था: शरीर नश्वर है और मरने के बाद हमारी आंखें किसी और की दुनिया को रोशन कर सकती हैं। धीरू मिस्त्री ने इस फिल्म को बहुत ही सरल लेकिन प्रभावी ढंग से बनाया था। 'साथ कुछ न जाएगा' का शीर्षक ही अपने आप में एक बड़ा दार्शनिक संदेश देता है कि मृत्यु के बाद मनुष्य अपने साथ कुछ नहीं ले जा सकता, इसलिए दूसरों की मदद करना ही सर्वोत्तम है। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ सूचनात्मक फिल्म (Best Informational Film) की श्रेणी में नेशनल अवार्ड मिला, जो इसकी सफलता और सामाजिक प्रासंगिकता का प्रमाण है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी इस कहानी का विशेष महत्व है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, दक्षिण एशियाई समुदायों में अंगदान की दर अक्सर अन्य समुदायों की तुलना में कम देखी गई है, जिसका एक मुख्य कारण सांस्कृतिक और पारंपरिक मान्यताएं रही हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में, जहां अंगदान के लिए जागरूकता अभियान लगातार चलाए जाते हैं, धीरू मिस्त्री जैसे फिल्म निर्माताओं का योगदान याद दिलाता है कि शिक्षा और कला के माध्यम से पुरानी रूढ़ियों को तोड़ा जा सकता है। आज जब हम चिकित्सा विज्ञान में इतनी प्रगति कर चुके हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि इस रास्ते की शुरुआत धीरू मिस्त्री जैसे लोगों ने की थी। उनकी फिल्म ने हजारों लोगों को नेत्रदान के संकल्प के लिए प्रेरित किया। वडोदरा के इस फिल्म निर्माता की विरासत आज भी उन हजारों लोगों की आंखों में जीवित है, जिन्हें इस फिल्म के माध्यम से फैली जागरूकता की बदौलत नई रोशनी मिली।
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