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‘झारखंड का हक दिल्ली तय नहीं करेगी’, माइनिंग बिल पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कड़ा रुख

ICN24 Newsroom 14 अग॰ 2026, 02:37 am
‘झारखंड का हक दिल्ली तय नहीं करेगी’, माइनिंग बिल पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कड़ा रुख

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संसद द्वारा पारित खान और खनिज संशोधन विधेयक, 2026 का कड़ा विरोध करते हुए इसे संघीय ढांचे पर हमला बताया है।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार द्वारा संसद के दोनों सदनों से पारित कराए गए ‘खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ पर कड़ा एतराज जताया है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि राज्य के संसाधनों और अधिकारों का फैसला दिल्ली की बंद दीवारों के पीछे नहीं लिया जा सकता। उन्होंने इस विधेयक को राज्य की स्वायत्तता पर एक सीधा हमला करार देते हुए केंद्र से इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है। सोरेन ने कहा कि यदि झारखंड के लोगों का हक छीना गया, तो राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेगी। मुख्यमंत्री सोरेन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व साझाकरण और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर बहस तेज हो गई है। झारखंड, जो भारत के कुल खनिज भंडार का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा रखता है, के लिए यह विधेयक आर्थिक और राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। सोरेन के अनुसार, यह कानून राज्यों की उन शक्तियों को कम करता है जो उन्हें अपने संसाधनों के प्रबंधन और उनसे मिलने वाली रॉयल्टी के निर्धारण का अधिकार देती हैं। उन्होंने तर्क दिया कि खनिज राज्य की संपत्ति हैं और उनके दोहन से होने वाला लाभ सीधे तौर पर वहां के मूल निवासियों और आदिवासियों तक पहुंचना चाहिए। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह घटनाक्रम विशेष महत्व रखता है। ऑस्ट्रेलिया भी एक ऐसा देश है जहां राज्यों (जैसे वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया और क्वींसलैंड) और संघीय सरकार के बीच माइनिंग रॉयल्टी और जमीन के अधिकारों को लेकर अक्सर खींचतान चलती रहती है। जिस तरह ऑस्ट्रेलिया में खनन से होने वाली आय राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है, वही स्थिति झारखंड की भी है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय मूल के लोग, विशेषकर वे जो माइनिंग और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में कार्यरत हैं, भारत के खनन क्षेत्र में हो रहे इन नीतिगत बदलावों पर बारीकी से नजर रखते हैं। हेमंत सोरेन ने अपने संबोधन में यह भी रेखांकित किया कि केंद्र सरकार 'सहकारी संघवाद' की बात तो करती है, लेकिन व्यवहार में वह राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण कर रही है। उन्होंने कहा कि झारखंड जैसा पिछड़ा राज्य अपनी खनिज संपदा के दम पर ही विकास की राह पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, लेकिन नए नियम निवेश और स्थानीय रोजगार के अवसरों को प्रभावित कर सकते हैं। मुख्यमंत्री ने संकेत दिया कि यदि केंद्र सरकार ने उनकी मांगों पर विचार नहीं किया, तो वे इस मुद्दे को कानूनी और जन आंदोलन के स्तर पर ले जाने के लिए तैयार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के संघीय ढांचे की एक बड़ी लड़ाई का हिस्सा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार महत्वपूर्ण क्षेत्रों में राज्यों की भूमिका को सीमित कर रही है। झारखंड की झामुमो (JMM) सरकार के लिए यह स्थानीय अस्मिता और हक की लड़ाई है, जिसे वे आने वाले समय में और प्रखर करेंगे। फिलहाल, पूरे देश की नजरें केंद्र की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं कि क्या वह इस विवादास्पद विधेयक पर पुनर्विचार करेगी या टकराव की स्थिति बरकरार रहेगी।
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