राजनीति
1857 की क्रांति: जब झांसी की रानी ने भोपाल की बेगम को दी थी कड़ी चेतावनी, नाना साहब पर इनाम से भड़की थीं लक्ष्मीबाई
ICN24 Newsroom 14 अग॰ 2026, 03:37 am
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने भोपाल की तत्कालीन शासिका सिकंदर बेगम को एक चेतावनी भरा पत्र लिखा था, जिसमें अंग्रेजों की मदद करने पर कड़ा ऐतराज जताया गया था।
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 की क्रांति के पन्ने आज भी वीरता और कूटनीतिक संघर्षों की कहानियों से भरे हुए हैं। हाल ही में प्रकाश में आए ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने भोपाल रियासत की तत्कालीन शासिका सिकंदर जहां बेगम को एक तीखा और चेतावनी भरा पत्र लिखा था। यह पत्र उस दौर की राजनीतिक जटिलताओं और भारतीय रियासतों के बीच वैचारिक मतभेदों को दर्शाता है।
वरिष्ठ पत्रकार बृजेंद्र पटेरिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस पत्र का मुख्य कारण भोपाल रियासत द्वारा ब्रिटिश हुकूमत को दिया जा रहा समर्थन था। रानी लक्ष्मीबाई इस बात से अत्यंत क्षुब्ध थीं कि जब देश का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा था, तब कुछ रियासतें कंपनी बहादुर की मदद कर रही थीं। सबसे बड़ी नाराजगी नाना साहब पेशवा पर रखे गए एक लाख रुपये के इनाम को लेकर थी। अंग्रेजों ने नाना साहब को पकड़ने के लिए उस समय यह बड़ी राशि घोषित की थी, और रानी का मानना था कि भारतीय रियासतों को इस दमनकारी नीति का विरोध करना चाहिए, न कि सहयोग।
इतिहासकारों के अनुसार, सिकंदर बेगम ने 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी थी। उन्होंने न केवल अपने क्षेत्र में विद्रोह को शांत करने में अंग्रेजों की मदद की, बल्कि रसद और खुफिया जानकारी भी साझा की। इसके विपरीत, रानी लक्ष्मीबाई और नाना साहब इस क्रांति के मुख्य स्तंभ थे। लक्ष्मीबाई ने अपने पत्र में स्पष्ट किया था कि विदेशी ताकतों का साथ देना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने भोपाल की बेगम को आगाह किया था कि इतिहास उनके इस कदम को कभी माफ नहीं करेगा।
यह ऐतिहासिक संदर्भ आज के दौर में भी प्रासंगिक है, खासकर ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए जो अपनी जड़ों और इतिहास को गहराई से समझना चाहते हैं। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में बसे भारतीय प्रवासियों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई केवल मैदान-ए-जंग तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह पत्रों और कूटनीति के जरिए भी लड़ी गई थी। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय अक्सर औपनिवेशिक इतिहास पर चर्चा करता है, और इस तरह के दस्तावेज उस दौर के असली संघर्ष को उजागर करते हैं।
रानी लक्ष्मीबाई का वह पत्र केवल एक धमकी नहीं, बल्कि स्वाभिमान और एकजुटता की पुकार थी। हालांकि भोपाल की बेगम ने अपनी रणनीति नहीं बदली, लेकिन इस पत्र ने यह सिद्ध कर दिया कि रानी केवल तलवार की धनी नहीं थीं, बल्कि उनकी दृष्टि अत्यंत व्यापक थी। वे जानती थीं कि जब तक सभी रियासतें एक नहीं होंगी, अंग्रेजों को बाहर निकालना कठिन होगा। आज यह घटना भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज है, जो हमें उस समय की आंतरिक चुनौतियों और महान नायकों के अडिग साहस की याद दिलाती है।
संबंधित ख़बरें

राजनीति
लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर के सुशासन और न्यायप्रियता ने देश को किया गौरवान्वित: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने देवी अहिल्याबाई होल्कर को सुशासन का प्रतीक बताते हुए उनके 300वें जन्म शताब्दी वर्ष पर दी श्रद्धांजलि।
14 अग॰ 2026, 05:37 am
राजनीति
पुतिन का विवादित कुरील द्वीप दौरा: रूस और जापान के बीच कूटनीतिक तनाव गहराया
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जापान द्वारा दावा किए गए विवादित कुरील द्वीप समूह का दौरा किया है, जिससे दोनों देशों के बीच दशकों पुराना क्षेत्रीय विवाद फिर से गरमा गया है।
14 अग॰ 2026, 04:37 am

राजनीति
‘झारखंड का हक दिल्ली तय नहीं करेगी’, माइनिंग बिल पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कड़ा रुख
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संसद द्वारा पारित खान और खनिज संशोधन विधेयक, 2026 का कड़ा विरोध करते हुए इसे संघीय ढांचे पर हमला बताया है।
14 अग॰ 2026, 02:37 am

