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पंजाब के खेतों में पसीना बहाते बिहार के प्रवासी: भीषण गर्मी और उमस के बीच धान की बुवाई का मोर्चा संभाला

ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 04:38 am
पंजाब के खेतों में पसीना बहाते बिहार के प्रवासी: भीषण गर्मी और उमस के बीच धान की बुवाई का मोर्चा संभाला

भीषण गर्मी और उमस के बीच बिहार के हजारों प्रवासी मजदूर पंजाब के खेतों में धान की रोपाई के लिए पहुंच गए हैं, जो भारत की खाद्य सुरक्षा की नींव रखते हैं।

जून का महीना आते ही भारत के 'अन्न भंडार' कहे जाने वाले पंजाब के खेतों में एक विशेष हलचल शुरू हो जाती है। यह समय है धान की रोपाई का, और इस भारी श्रम वाले काम को मुमकिन बनाने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे पूर्वी राज्यों से हजारों प्रवासी मजदूर पंजाब की धरती पर कदम रखते हैं। भीषण गर्मी और रिकॉर्ड तोड़ उमस के बावजूद, ये मजदूर सुबह की पहली किरण से लेकर शाम ढलने तक खेतों में डटे रहते हैं। यह वार्षिक प्रवास भारतीय कृषि का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। पंजाब में धान की रोपाई मुख्य रूप से मैन्युअल श्रम पर निर्भर है, जिसमें मजदूरों को टखनों तक भरे पानी में झुककर धान के नन्हे पौधों को लगाना पड़ता है। इस वर्ष भी, लुधियाना, जालंधर और पटियाला जैसे जिलों के रेलवे स्टेशनों पर इन मजदूरों की भारी भीड़ देखी गई। शरीर से इकहरे और मेहनती ये मजदूर न केवल अपनी जीविका के लिए यहां आते हैं, बल्कि पंजाब की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी गति देते हैं। मौसम विभाग की चेतावनियों और बढ़ते तापमान के बीच इन मजदूरों के लिए काम करना किसी चुनौती से कम नहीं है। 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच के तापमान में भी ये मजदूर बिना रुके काम करते हैं। स्थानीय किसानों का कहना है कि मशीनीकरण के बावजूद, हाथ से की गई रोपाई का कोई विकल्प नहीं है क्योंकि इससे फसल की गुणवत्ता और पैदावार बेहतर होती है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में मजदूरों की कमी और बढ़ती मजदूरी ने कृषि क्षेत्र में नई चुनौतियां पेश की हैं। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर वे जो पंजाब और बिहार से ताल्लुक रखते हैं, उनके लिए यह खबर एक गहरी जड़ से जुड़ाव महसूस कराती है। जिस तरह ऑस्ट्रेलिया में कृषि क्षेत्र 'सीज़नल वर्कर्स' (मौसमी मजदूरों) पर निर्भर है, उसी तरह भारत के इन राज्यों के बीच का यह श्रम संबंध भी वैश्विक खाद्य श्रृंखला के एक महत्वपूर्ण पहलू को दर्शाता है। कई प्रवासी भारतीय (NRIs) आज भी पंजाब में अपनी पुश्तैनी जमीन रखते हैं और वे इन चुनौतियों से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। निष्कर्षतः, बिहार के इन प्रवासी मजदूरों का संघर्ष केवल आर्थिक मजबूरी की कहानी नहीं है, बल्कि यह उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और भारत की कृषि व्यवस्था में उनके अपरिहार्य योगदान का प्रमाण है। बिना इन हाथों के, भारत की खाद्य सुरक्षा की कल्पना करना कठिन है।
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