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उपेंद्र कुशवाहा का बड़ा खुलासा: भाजपा ने दिया था पार्टी विलय का सुझाव, नीतीश के 'उत्तराधिकारी' चयन पर साधा निशाना
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 01:23 pm

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने खुलासा किया है कि भाजपा ने उन्हें पार्टी विलय की सलाह दी थी। उन्होंने नीतीश कुमार द्वारा उत्तराधिकारी न चुन पाने को उनकी बड़ी चूक बताया।
बिहार की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। कुशवाहा ने स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेतृत्व ने उन्हें अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करने का सुझाव दिया था। हालांकि, उन्होंने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि वे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखना चाहते हैं। यह खुलासा ऐसे समय में आया है जब बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर गठबंधन के भीतर समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
कुशवाहा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि जदयू (JDU) प्रमुख अपने राजनीतिक जीवन में एक योग्य उत्तराधिकारी तैयार करने में पूरी तरह विफल रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि नीतीश कुमार ने लंबे समय तक सत्ता संभाली, लेकिन जब विरासत सौंपने की बात आई, तो उन्होंने ऐसे निर्णय लिए जिससे पार्टी के भीतर और बाहर असंतोष पैदा हुआ। कुशवाहा के अनुसार, नीतीश कुमार की इसी 'चूक' के कारण बिहार की राजनीति में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। उन्होंने संकेत दिया कि नीतीश द्वारा कभी तेजस्वी यादव को आगे बढ़ाना और फिर पीछे हटना उनके असमंजस को दर्शाता है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे प्रवासी भारतीय समुदाय, विशेषकर बिहार से ताल्लुक रखने वाले लोगों के लिए यह राजनीतिक घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में रहने वाले बिहारी डायस्पोरा अक्सर राज्य की स्थिरता और विकास को लेकर चिंतित रहते हैं। बिहार में नेतृत्व का संकट न केवल स्थानीय प्रशासन को प्रभावित करता है, बल्कि प्रवासियों द्वारा किए जाने वाले निवेश और 'रूट्स कनेक्ट' कार्यक्रमों पर भी असर डालता है। उपेंद्र कुशवाहा का यह बयान दर्शाता है कि एनडीए (NDA) के भीतर भी सब कुछ सामान्य नहीं है और क्षेत्रीय दल अपनी स्वायत्तता को लेकर सजग हैं।
कुशवाहा ने अपनी भविष्य की रणनीति पर बात करते हुए कहा कि वे पिछड़ों और अति पिछड़ों की राजनीति को मजबूत करना चाहते हैं। उन्होंने माना कि भाजपा के साथ उनके संबंध सौहार्दपूर्ण हैं, लेकिन विलय का मतलब अपने कैडर और विचारधारा के साथ समझौता करना होता। बिहार की राजनीति के जानकारों का मानना है कि कुशवाहा के इस बयान से भाजपा और जदयू दोनों पर दबाव बढ़ेगा। जहां एक ओर भाजपा छोटे दलों को अपने साथ समेटने की कोशिश में है, वहीं नीतीश कुमार के सामने अपनी विरासत को बचाने की बड़ी चुनौती है।
कुल मिलाकर, उपेंद्र कुशवाहा की यह बेबाकी बिहार में नए राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर इशारा करती है। चुनाव से पहले इस तरह के खुलासे गठबंधन की आंतरिक कलह को उजागर करते हैं। प्रवासी भारतीयों के लिए, जो अपने गृह राज्य की प्रगति पर नजर रखते हैं, यह स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति अभी भी व्यक्तित्वों और उत्तराधिकार की लड़ाई के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिससे नीतिगत स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
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