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राजा परीक्षित की मृत्यु और ऋषि का श्राप: सात दिनों में जीवन से मोक्ष तक की वह पौराणिक गाथा

ICN24 Newsroom 2 जुल॰ 2026, 11:31 pm
राजा परीक्षित की मृत्यु और ऋषि का श्राप: सात दिनों में जीवन से मोक्ष तक की वह पौराणिक गाथा

अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित की मृत्यु एक ऋषि पुत्र के श्राप के कारण हुई थी। जानिए कैसे मात्र सात दिनों में उन्होंने तक्षक नाग के दंश और मोक्ष को प्राप्त किया।

भारतीय पौराणिक इतिहास में राजा परीक्षित का नाम एक न्यायप्रिय और धर्मपरायण शासक के रूप में दर्ज है। अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने महाभारत युद्ध के पश्चात कुरु वंश की कमान संभाली थी। हालांकि, उनके जीवन का अंत एक ऐसी नाटकीय और आध्यात्मिक घटना के साथ हुआ, जो आज भी हिंदू धर्मग्रंथों में विशेष महत्व रखती है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, राजा परीक्षित की मृत्यु एक अनजाने में किए गए अपराध और उसके फलस्वरूप मिले श्राप के कारण हुई थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार राजा परीक्षित जंगल में शिकार खेल रहे थे। लंबी दौड़ और थकान के कारण उन्हें तीव्र प्यास लगी। पानी की तलाश में वे ऋषि शमीक के आश्रम पहुंचे। उस समय ऋषि शमीक गहरे ध्यान में लीन थे और उन्होंने राजा की उपस्थिति पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। राजा ने इसे अपना अपमान समझा। भूख और प्यास से व्याकुल राजा परीक्षित के विवेक पर कलयुग का प्रभाव पड़ा और उन्होंने पास में पड़े एक मृत सांप को अपने धनुष से उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। जब ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी को इस घटना का पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने कौशिकी नदी का जल हाथ में लेकर राजा को श्राप दिया कि आज से ठीक सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से उनकी मृत्यु हो जाएगी। जब ऋषि शमीक का ध्यान टूटा और उन्हें इस श्राप का पता चला, तो उन्हें अत्यंत दुख हुआ, क्योंकि वे जानते थे कि राजा परीक्षित एक धर्मात्मा शासक थे और उन्होंने यह कृत्य केवल व्याकुलता में किया था। राजा परीक्षित ने जब इस श्राप के बारे में सुना, तो उन्होंने इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया। उन्होंने राज-पाट का त्याग कर दिया और अपने अंतिम सात दिनों को ईश्वर की भक्ति में लगाने का निर्णय लिया। वे गंगा के तट पर पहुंचे, जहां उनकी भेंट शुकदेव जी से हुई। अगले सात दिनों तक शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत महापुराण का श्रवण कराया। इस कथा के माध्यम से राजा ने जीवन और मृत्यु के सत्य को समझा और अंततः मोक्ष की प्राप्ति की। सातवें दिन, नियति के अनुसार तक्षक नाग ने उन्हें डंसा, लेकिन उस समय तक परीक्षित का मन भौतिक शरीर से ऊपर उठकर परमात्मा में विलीन हो चुका था। आज के समय में, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए, राजा परीक्षित की यह कथा केवल एक कहानी नहीं बल्कि धैर्य और विनम्रता का पाठ है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में स्थित भारतीय सांस्कृतिक केंद्रों में अक्सर ऐसी कथाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और कर्म के सिद्धांतों से जोड़ा जाता है। यह कथा सिखाती है कि सत्ता और क्रोध के क्षणों में भी संयम आवश्यक है, और मृत्यु जैसे अटल सत्य का सामना आध्यात्मिक ज्ञान के साथ करना ही सच्ची विजय है।
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