राजनीति
रिश्तों में कमिटमेंट से दूरी: क्या भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई युवा जिम्मेदारी से कतरा रहे हैं?
ICN24 Newsroom 11 जुल॰ 2026, 12:31 pm
आधुनिक दौर के रिश्तों में 'कमिटमेंट' एक बड़ा सवाल बन गया है। रश्मि बंसल के विचारों के आलोक में, आईसीएम24 ने पड़ताल की है कि आखिर क्यों आज की पीढ़ी स्थायी रिश्तों से घबरा रही है।
आज के दौर में रिश्तों की परिभाषा तेजी से बदल रही है। दुनिया में अक्सर दो तरह के माता-पिता पाए जाते हैं: एक वे जो अपने बच्चों की जीवनशैली और उनकी हरकतों से पूरी तरह ‘अनजान’ हैं, और दूसरे वे जो उनकी बदलती प्राथमिकताओं से ‘परेशान’ हैं। यह मुद्दा विशेष रूप से उन युवाओं के इर्द-गिर्द घूमता है जो कानूनी तौर पर तो बालिग हो चुके हैं, लेकिन जब बात जीवन के बड़े फैसलों या किसी व्यक्ति के प्रति स्थायी जुड़ाव की आती है, तो वे पीछे हटते नजर आते हैं।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के बीच यह समस्या एक नए रूप में सामने आ रही है। सिडनी और मेलबर्न जैसे महानगरों में रहने वाले युवा अपनी पेशेवर जिंदगी में तो काफी सफल हैं, लेकिन निजी संबंधों में वे 'कमिटमेंट-फोबिया' का शिकार हो रहे हैं। वरिष्ठ स्तंभकार रश्मि बंसल के हालिया विचारों ने इस बहस को एक नई दिशा दी है। उनके अनुसार, आज के युवा एक-दूसरे को वचन देने या भविष्य की योजना बनाने से डरते हैं। माता-पिता की नजर में उनके बच्चे आज भी अपरिपक्व हैं क्योंकि वे जिम्मेदारी उठाने के बजाय विकल्पों की तलाश में रहना पसंद करते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय प्रवासियों के लिए यह सांस्कृतिक द्वंद्व का विषय है। एक तरफ जहां पारंपरिक भारतीय मूल्य विवाह और स्थायी संबंधों पर जोर देते हैं, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी डेटिंग संस्कृति 'हुक-अप' और 'सिचुएशनशिप' को बढ़ावा देती है। इस माहौल में पला-बढ़ा युवा वर्ग अक्सर यह तय नहीं कर पाता कि वह किस रास्ते पर चले। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि युवाओं में बढ़ती असुरक्षा और स्वतंत्रता खोने का डर उन्हें किसी एक रिश्ते में बंधने से रोकता है। डिजिटल क्रांति और डेटिंग ऐप्स ने 'विकल्पों की बहुतायत' पैदा कर दी है, जिससे किसी एक व्यक्ति के साथ जीवन बिताने का विचार उन्हें बोझिल लगने लगता है।
आंकड़े बताते हैं कि भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय में विवाह की औसत उम्र पिछले एक दशक में बढ़ी है। युवा अब पहले करियर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि, इस स्वतंत्रता के साथ अकेलापन भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। माता-पिता का परेशान होना जायज है क्योंकि वे अपने बच्चों के लिए वही स्थिरता चाहते हैं जो उन्होंने अपने समय में देखी थी। लेकिन आज का युवा 'परफेक्ट पार्टनर' की तलाश में इतना व्यस्त है कि वह वास्तविक रिश्तों में आने वाली चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
अंततः, यह केवल दो पीढ़ियों का टकराव नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों का परिणाम है। रश्मि बंसल का विश्लेषण हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो भावनाओं से ज्यादा विकल्पों को महत्व देती है। इस समस्या का समाधान संवाद और एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने में ही छिपा है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई युवाओं को यह समझना होगा कि कमिटमेंट बंधन नहीं, बल्कि एक सुरक्षित भविष्य की नींव है।
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