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तमिलनाडु में गौहत्या पर हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, राज्य सरकार को मिली बड़ी राहत

ICN24 Newsroom 14 जुल॰ 2026, 12:31 am
तमिलनाडु में गौहत्या पर हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, राज्य सरकार को मिली बड़ी राहत

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है जिसमें तमिलनाडु में बकरीद या किसी भी अन्य दिन गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया था।

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को एक बड़ी कानूनी राहत देते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के उस हालिया आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें राज्य भर में गायों और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने सोमवार को यह फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में बकरीद जैसे धार्मिक त्योहारों के साथ-साथ अन्य सामान्य दिनों में भी गौहत्या पर रोक लगाने की बात कही थी। तमिलनाडु सरकार ने उच्च न्यायालय के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। राज्य सरकार का तर्क था कि उच्च न्यायालय का निर्देश कानून के मौजूदा प्रावधानों और राज्य की नीतिगत शक्तियों के खिलाफ है। सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत ने माना कि यह मामला विस्तृत जांच का विषय है और फिलहाल उच्च न्यायालय के निर्देशों के क्रियान्वयन पर रोक लगाना आवश्यक है। अदालत ने इस मामले में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख्त रुख अपनाया था। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि राज्य में गौवंश के संरक्षण के लिए कड़े कदम उठाए जाने चाहिए और किसी भी परिस्थिति में गौहत्या की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, तमिलनाडु सरकार ने अपनी दलील में कहा कि राज्य में 'तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958' पहले से ही प्रभावी है, जो पशुओं के वध और उनके संरक्षण से संबंधित नियमों को विनियमित करता है। सरकार के अनुसार, अदालत का आदेश राज्य के विधायी ढांचे में हस्तक्षेप की तरह था। भारत में गौहत्या का मुद्दा लंबे समय से कानूनी और सामाजिक बहस का केंद्र रहा है। विभिन्न राज्यों में इसे लेकर अलग-अलग कानून हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी भारत की कानूनी व्यवस्था के ये उतार-चढ़ाव विशेष रुचि का विषय होते हैं, क्योंकि यह सीधे तौर पर भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि और संवैधानिक संतुलन से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप स्पष्ट करता है कि कानून और धार्मिक मान्यताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी अंततः न्यायपालिका और विधायिका की साझा प्रक्रिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए तिथि निर्धारित की है। तब तक के लिए राज्य सरकार को हाईकोर्ट के उस आदेश का पालन करने की आवश्यकता नहीं होगी जो पूर्ण प्रतिबंध की वकालत करता था। इस फैसले को राज्य की प्रशासनिक स्वायत्तता के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है, क्योंकि यह सीधे तौर पर इस बात को प्रभावित करता है कि राज्य सरकारें अपने क्षेत्रीय कानूनों को कैसे लागू करती हैं।
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