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अवैध चयन का आरोप: कर्नाटक के राज्यपाल ने केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा साहूकार को निलंबित किया

ICN24 Newsroom 14 जुल॰ 2026, 03:31 am
अवैध चयन का आरोप: कर्नाटक के राज्यपाल ने केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा साहूकार को निलंबित किया

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने केपीएससी अध्यक्ष शिवशंकरप्पा एस. साहूकार को उनकी बेटियों के सरकारी सेवा में कथित अवैध चयन के आरोपों के बाद निलंबित कर दिया है।

कर्नाटक की राजनीति में एक बड़े घटनाक्रम के तहत, राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) के अध्यक्ष शिवशंकरप्पा एस. साहूकार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कड़ी कार्रवाई साहूकार की बेटियों के सरकारी सेवाओं में कथित तौर पर 'अवैध चयन' और पद के दुरुपयोग के गंभीर आरोपों के बाद की गई है। राजभवन द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि आयोग की पवित्रता बनाए रखने और जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य था। मामले की जड़ें उन आरोपों में छिपी हैं जिनमें दावा किया गया है कि साहूकार ने अपने पद का अनुचित लाभ उठाते हुए अपनी बेटियों को राज्य सरकार की प्रतिष्ठित सेवाओं में स्थान दिलाने में मदद की। इन अनियमितताओं की शिकायतें काफी समय से हो रही थीं, जिसके बाद राज्यपाल ने मामले का संज्ञान लिया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 317 के तहत मिली शक्तियों का प्रयोग करते हुए, राज्यपाल ने राष्ट्रपति को भी इस संबंध में सूचित किया है, क्योंकि लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष का पद एक संवैधानिक पद होता है और इसके निलंबन या निष्कासन की प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील होती है। कर्नाटक की प्रशासनिक मशीनरी में केपीएससी (KPSC) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संस्था राज्य के राजपत्रित अधिकारियों की भर्ती के लिए जिम्मेदार है। हाल के वर्षों में केपीएससी कई बार विवादों के घेरे में रही है, जिससे राज्य के लाखों उम्मीदवारों का भरोसा डगमगाया है। साहूकार के खिलाफ इस कार्रवाई को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है। विपक्षी दलों ने इस कदम का स्वागत किया है, जबकि राज्य की सत्ताधारी कांग्रेस सरकार और राज्यपाल के बीच पहले से ही जारी तनाव इस फैसले के बाद और बढ़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर कर्नाटक मूल के प्रवासियों के लिए यह खबर चिंता का विषय है। प्रवासी भारतीय अक्सर भारत में अपने गृह राज्यों के सुशासन और पारदर्शी चयन प्रक्रियाओं में गहरी रुचि रखते हैं, क्योंकि उनके परिवारों के युवा सदस्य इन्हीं परीक्षाओं के माध्यम से करियर बनाने की कोशिश करते हैं। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में रहने वाले कन्नड़ समुदाय के बीच इस निलंबन की चर्चा तेज है। उनका मानना है कि इस तरह की कार्रवाइयां योग्यता आधारित समाज (meritocracy) के निर्माण के लिए जरूरी हैं। फिलहाल, राज्यपाल के इस आदेश के बाद अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी जा सकता है, क्योंकि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के निलंबन की न्यायिक समीक्षा की संभावना हमेशा बनी रहती है। कर्नाटक सरकार ने अभी तक इस पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य विधानसभा में हंगामे का कारण बन सकता है। शासन में पारदर्शिता और लोक सेवा आयोगों की स्वायत्तता एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस का केंद्र बन गई है।
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