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रिलायंस जियो की सैटेलाइट इंटरनेट क्षेत्र में बड़ी तैयारी; स्वदेशी उपग्रह नेटवर्क विकसित करने पर विचार

ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 02:41 pm
रिलायंस जियो की सैटेलाइट इंटरनेट क्षेत्र में बड़ी तैयारी; स्वदेशी उपग्रह नेटवर्क विकसित करने पर विचार

मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो भारत में अपना स्वयं का 'लो अर्थ ऑर्बिट' (LEO) सैटेलाइट नेटवर्क विकसित करने की योजना बना रही है, जो वैश्विक कंपनियों को कड़ी टक्कर देगा।

भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी, रिलायंस जियो, अब अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपनी धाक जमाने की तैयारी कर रही है। उद्योग जगत की ताजा खबरों के अनुसार, जियो भारत के लिए एक संप्रभु (sovereign) 'लो अर्थ ऑर्बिट' (LEO) सैटेलाइट समूह विकसित करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रहा है। यह कदम न केवल भारत के दूरसंचार परिदृश्य को बदल सकता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर सैटेलाइट इंटरनेट सेवा प्रदाताओं के लिए एक बड़ी चुनौती भी पेश कर सकता है। जियो का यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब भारत में सैटेलाइट कम्युनिकेशन (SatCom) बाजार में प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। एलन मस्क की स्टारलिंक और सुनील मित्तल समर्थित वनवेब (Eutelsat OneWeb) पहले से ही इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। जियो का लक्ष्य एक ऐसा स्वदेशी नेटवर्क तैयार करना है जो भारत की भौगोलिक सीमाओं के भीतर डेटा सुरक्षा और उच्च गति वाली कनेक्टिविटी सुनिश्चित कर सके। LEO उपग्रहों की विशेषता यह है कि वे पृथ्वी की सतह से काफी कम ऊंचाई (लगभग 500 से 2,000 किमी) पर स्थित होते हैं। पारंपरिक भू-स्थैतिक (Geostationary) उपग्रहों की तुलना में, LEO उपग्रह कम 'लेटेंसी' (डेटा ट्रांसफर में होने वाली देरी) के साथ इंटरनेट प्रदान करते हैं। यह उन क्षेत्रों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है जहां फाइबर केबल बिछाना मुश्किल है, जैसे कि हिमालय के दुर्गम इलाके या ग्रामीण भारत के दूर-दराज के गांव। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर महत्वपूर्ण है। ऑस्ट्रेलिया में एनबीएन (NBN) के स्काई मस्टर और स्टारलिंक जैसे सैटेलाइट इंटरनेट पहले से ही ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन रेखा बने हुए हैं। रिलायंस जैसी भारतीय कंपनी का इस क्षेत्र में आना यह दर्शाता है कि भारतीय कॉर्पोरेट जगत अब केवल सेवाओं का उपभोग नहीं कर रहा, बल्कि अपनी तकनीक और बुनियादी ढांचा विकसित करने की क्षमता रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जियो इस योजना में सफल होता है, तो वह भविष्य में अन्य विकासशील देशों को भी अपनी सेवाएं दे सकता है। व्यावसायिक दृष्टि से, रिलायंस जियो का यह कदम उसे एक 'प्योर-प्ले' टेलीकॉम ऑपरेटर से बदलकर एक संपूर्ण टेक और इंफ्रास्ट्रक्चर दिग्गज के रूप में स्थापित करेगा। कंपनी की रणनीति हमेशा से 'पैमाने की अर्थव्यवस्था' (economies of scale) पर आधारित रही है, जिससे वह कम कीमतों पर सेवाएं प्रदान कर प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़ देती है। हालांकि, उपग्रह प्रक्षेपण और रखरखाव में आने वाली भारी लागत जियो के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। भारत सरकार की नई अंतरिक्ष नीति और स्पेक्ट्रम आवंटन के नियमों पर भी जियो की इस योजना की सफलता निर्भर करेगी।
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