राजनीति
पुनर्विवाह के बाद गुजारा भत्ता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झांसी के फैमिली कोर्ट जज से मांगा जवाब
ICN24 Newsroom 10 जुल॰ 2026, 05:31 pm

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झांसी की फैमिली कोर्ट के उस आदेश पर सख्त रुख अपनाया है, जिसमें पुनर्विवाह कर चुकी महिला को पूर्व पति से गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में एक गंभीर त्रुटि को रेखांकित करते हुए झांसी की एक फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश से स्पष्टीकरण तलब किया है। मामला एक महिला को उसके पुनर्विवाह के बावजूद पूर्व पति से मासिक गुजारा भत्ता दिलाने से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने इस आदेश को कानून की स्थापित मान्यताओं के विपरीत मानते हुए कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायमूर्ति रजत सिंह की एकल पीठ ने उस पति की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए, जो वर्षों से इस कानूनी लड़ाई को लड़ रहा है।
मामले के विवरण के अनुसार, संबंधित महिला का अपने पूर्व पति से तलाक हो चुका था और उसने वर्ष 2014 में ही दूसरी शादी कर ली थी। भारतीय कानून, विशेष रूप से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत, एक तलाकशुदा पत्नी तब तक भरण-पोषण की हकदार होती है जब तक कि वह दूसरी शादी नहीं कर लेती। हालांकि, झांसी की फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश ने इन तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए पति को आदेश दिया कि वह अपनी पूर्व पत्नी को गुजारा भत्ता देना जारी रखे। पति का तर्क था कि जब महिला ने आधिकारिक तौर पर दूसरी शादी कर ली है, तो उस पर वित्तीय बोझ डालना कानून का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए न केवल संबंधित न्यायाधीश से यह पूछा है कि किन परिस्थितियों में ऐसा आदेश पारित किया गया, बल्कि उस महिला को भी नोटिस जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया यह आदेश कानून की वैधानिक सीमाओं का उल्लंघन प्रतीत होता है। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि न्यायिक अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे आदेश पारित करते समय बुनियादी कानूनी प्रावधानों और पक्षों की वैवाहिक स्थिति का सावधानीपूर्वक अध्ययन करें।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय (Indian-Australian Community) के लिए इस तरह के फैसले अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अक्सर देखा गया है कि एनआरआई (NRI) वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण और गुजारा भत्ता एक जटिल मुद्दा बन जाता है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे कई भारतीय नागरिक भारत में चल रहे वैवाहिक मुकदमों का सामना करते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह कड़ा रुख उन मामलों में राहत दे सकता है जहां कानूनों का गलत अर्थ निकालकर वित्तीय शोषण की स्थिति पैदा की जाती है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि पुनर्विवाह के बाद वित्तीय जिम्मेदारी पूर्व पति से समाप्त होकर वर्तमान स्थिति पर स्थानांतरित हो जाती है।
अब इस मामले की अगली सुनवाई कुछ हफ्तों बाद होगी, जिसमें फैमिली कोर्ट के जज का जवाब और महिला का पक्ष देखा जाएगा। तब तक के लिए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाने के संकेत दिए हैं। यह मामला न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही तय करने और कानून की उचित व्याख्या सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।
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