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'अल्फा' ने खड़े किए गंभीर सवाल: क्या बॉलीवुड की 'महिला प्रधान' फिल्में अब भी पुरुषों के इर्द-गिर्द घूमती हैं?

ICN24 Newsroom 10 जुल॰ 2026, 01:31 pm
'अल्फा' ने खड़े किए गंभीर सवाल: क्या बॉलीवुड की 'महिला प्रधान' फिल्में अब भी पुरुषों के इर्द-गिर्द घूमती हैं?

आलिया भट्ट और शरवरी वाघ की फिल्म 'अल्फा' के रिलीज के बाद भारतीय सिनेमा में महिला सशक्तिकरण और उनकी भूमिकाओं पर एक नई बहस छिड़ गई है।

यशराज फिल्म्स (YRF) की बहुप्रतीक्षित स्पाई यूनिवर्स फिल्म 'अल्फा' को लेकर दर्शकों और समीक्षकों के बीच काफी उत्साह था। आलिया भट्ट और शरवरी वाघ अभिनीत इस फिल्म को बॉलीवुड में 'फेम फेटेल' (femme fatale) की परिभाषा बदलने और महिलाओं के नेतृत्व वाली एक्शन फिल्मों को एक नई ऊंचाई देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा था। हालांकि, फिल्म के प्रदर्शन और इसकी कहानी की संरचना ने एक महत्वपूर्ण सवाल को फिर से जन्म दे दिया है: क्या बॉलीवुड की महिला-प्रधान फिल्में वास्तव में महिलाओं के दृष्टिकोण से बनाई जा रही हैं, या वे अभी भी पुरुषों द्वारा स्थापित मानकों और पितृसत्तात्मक सांचों के भीतर ही सीमित हैं? ऐतिहासिक रूप से, बॉलीवुड में मुख्यधारा के सिनेमा का झुकाव पुरुष नायकों की ओर रहा है। जब 'अल्फा' की घोषणा की गई, तो इसे फिल्म उद्योग में एक बड़े बदलाव के रूप में प्रचारित किया गया। लेकिन रिलीज के बाद, समीक्षाओं में यह बात उभरकर सामने आई है कि कहानी का मूल ढांचा अभी भी उन्ही पुराने फार्मूलों पर आधारित है जो 'पठान' या 'टाइगर' जैसी फिल्मों में देखे गए थे। समीक्षकों का तर्क है कि फिल्म केवल मुख्य अभिनेत्रियों को पुरुष किरदारों की तरह ही एक्शन करते हुए दिखाती है, लेकिन उनके चरित्र निर्माण में वह संवेदनशीलता या मौलिकता गायब है जो एक वास्तविक महिला-प्रधान कहानी में होनी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए, बॉलीवुड फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और पहचान से जुड़ाव का एक माध्यम भी हैं। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों के सिनेमाघरों में भारतीय फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता यह दर्शाती है कि प्रवासी दर्शक भी अब अधिक सार्थक और संतुलित प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलियाई दर्शक, जो हॉलीवुड के बदलते स्वरूप को करीब से देखते हैं, बॉलीवुड से भी उम्मीद करते हैं कि वह केवल 'मर्दाना' एक्शन को महिला चेहरों के साथ पेश करने के बजाय, सशक्त महिला किरदारों के लिए एक स्वतंत्र और मौलिक दृष्टिकोण विकसित करे। विशेषज्ञों का मानना है कि बॉलीवुड को 'महिला प्रधान' फिल्मों के प्रति अपनी समझ में सुधार करने की आवश्यकता है। केवल एक महिला को मुख्य भूमिका में रखना ही पर्याप्त नहीं है; उस पात्र की एजेंसी, उसके निर्णय और कहानी पर उसका प्रभाव पुरुष किरदारों की छाया से मुक्त होना चाहिए। 'अल्फा' के मामले में यह देखा गया कि नायक की प्रेरणाएं और चुनौतियों का समाधान अक्सर उन्हीं पुराने तौर-तरीकों से होता है जो दशकों से पुरुष-प्रधान फिल्मों की पहचान रहे हैं। निष्कर्षतः, 'अल्फा' ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय सिनेमा एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। फिल्म उद्योग को यह समझने की जरूरत है कि महिलाओं के नेतृत्व वाली फिल्में तभी सफल होंगी जब वे पितृसत्तात्मक चश्मे को उतारकर दुनिया को महिलाओं की नजर से देखना शुरू करेंगी।
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