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क्या प्रेम वास्तव में सत्य है? ओशो के अनुसार प्रेम और मोह के बीच का बारीक अंतर

ICN24 Newsroom 13 अग॰ 2026, 08:38 pm
क्या प्रेम वास्तव में सत्य है? ओशो के अनुसार प्रेम और मोह के बीच का बारीक अंतर

ओशो के दर्शन में प्रेम को स्वतंत्रता और मोह को बंधन माना गया है। जानें कैसे यह विचारधारा आधुनिक प्रवासी भारतीयों के संबंधों को नई दिशा दे सकती है।

प्रेम की परिभाषा समय-समय पर बदलती रही है, लेकिन ओशो के दार्शनिक दृष्टिकोण में इसे सत्य का एक रूप माना गया है। ओशो के अनुसार, जिसे हम अक्सर प्रेम कहते हैं, वह वास्तव में 'मोह' या आसक्ति (attachment) होता है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए, जहाँ सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक जीवनशैली का संगम होता है, प्रेम और मोह के बीच के इस अंतर को समझना पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों को नई गहराई दे सकता है। ओशो का तर्क है कि प्रेम और मोह के बीच सबसे बड़ा अंतर 'स्वतंत्रता' का है। प्रेम दूसरे व्यक्ति को मुक्त करता है, जबकि मोह उसे बांधने की कोशिश करता है। जब आप किसी से प्रेम करते हैं, तो आप उनकी खुशी में खुश होते हैं, चाहे वे आपके साथ हों या न हों। इसके विपरीत, मोह में अधिकार की भावना प्रबल होती है। यहाँ 'मैं' और 'मेरा' का अहंकार हावी हो जाता है, जिससे संबंध बोझ बन जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित समाज में रह रहे प्रवासियों के लिए, जहाँ अक्सर अकेलेपन और असुरक्षा का भाव रहता है, यह समझना जरूरी है कि मोह केवल अपनी कमियों को दूसरे से भरने का प्रयास है। प्रवासी भारतीयों के संदर्भ में, विशेषकर जहाँ बहुसांस्कृतिक माहौल है, अक्सर रिश्तों में नियंत्रण की भावना देखी जाती है। ओशो कहते हैं कि मोह वास्तव में अपनी असुरक्षाओं को दूसरे पर थोपना है। जब हम किसी को अपनी संपत्ति समझने लगते हैं, तो वह प्रेम नहीं रह जाता। प्रेम एक खुला आकाश है, जबकि मोह एक पिंजरा है, चाहे वह सोने का ही क्यों न हो। मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में बसने वाले भारतीय परिवार अक्सर परंपरा और आधुनिकता के बीच द्वंद्व झेलते हैं; यहाँ ओशो की शिक्षा रिश्तों में 'स्पेस' देने की वकालत करती है। दार्शनिक रूप से, ओशो प्रेम को ध्यान (meditation) के समान मानते हैं। उनके अनुसार, प्रेम तब घटित होता है जब आप स्वयं में पूर्ण होते हैं। यदि आप अपनी कमी को भरने के लिए किसी के पास जाते हैं, तो वह केवल एक सौदा या मोह है। प्रेम केवल वही दे सकता है जो भीतर से समृद्ध हो। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय युवाओं के लिए यह विचार विशेष रूप से प्रासंगिक है, जो अक्सर पश्चिमी व्यक्तिवाद और पारंपरिक भारतीय सामूहिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अंततः, ओशो के अनुसार प्रेम ही एकमात्र सत्य है क्योंकि यह स्वार्थ से परे है। मोह समय के साथ समाप्त हो सकता है और अक्सर घृणा में बदल जाता है, लेकिन सच्चा प्रेम स्थिर रहता है। यह आत्म-साक्षात्कार का एक मार्ग है। रिश्तों में पारदर्शिता, करुणा और स्वतंत्रता को महत्व देकर ही हम उस सत्य तक पहुँच सकते हैं जिसे ओशो ने परिभाषित किया है। यह दर्शन केवल व्यक्तिगत शांति के लिए नहीं, बल्कि एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए भी आवश्यक है।
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