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क्या प्रेम वास्तव में सत्य है? ओशो के दर्शन में प्रेम और मोह के बीच के गहरे अंतर का विश्लेषण

ICN24 Newsroom 13 अग॰ 2026, 08:37 pm
क्या प्रेम वास्तव में सत्य है? ओशो के दर्शन में प्रेम और मोह के बीच के गहरे अंतर का विश्लेषण

ओशो के अनुसार प्रेम और मोह दो विपरीत ध्रुव हैं। जहां प्रेम स्वतंत्रता का मार्ग है, वहीं मोह व्यक्ति को मानसिक बेड़ियों में जकड़ता है।

सदियों से कवियों, दार्शनिकों और विचारकों ने प्रेम की परिभाषा खोजने का प्रयास किया है, लेकिन ओशो के विचार इस विषय पर एक क्रांतिकारी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान समय में, जहां मानवीय संबंध डिजिटल युग की जटिलताओं और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बीच घिरे हैं, ओशो का यह प्रश्न कि 'क्या प्रेम वास्तव में सत्य है' और भी प्रासंगिक हो जाता है। उनके अनुसार, हम जिसे प्रेम समझते हैं, वह अक्सर केवल 'मोह' या आसक्ति होता है, जो सत्य से कोसों दूर है। ओशो के दर्शन के केंद्र में यह विचार है कि प्रेम का अर्थ दूसरे को स्वतंत्रता देना है। वे स्पष्ट करते हैं कि प्रेम और मोह में मौलिक अंतर है। मोह एक प्रकार का 'कब्जा' है, जहां एक व्यक्ति दूसरे को अपनी संपत्ति समझने लगता है। जब हम कहते हैं कि हम किसी से प्रेम करते हैं और साथ ही उन पर नियंत्रण रखना चाहते हैं, तो वह प्रेम नहीं बल्कि अहंकार की तुष्टि है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए, जो अक्सर दो संस्कृतियों के मिलन बिंदु पर खड़े होते हैं, यह समझ पारिवारिक सामंजस्य बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। प्रेम और मोह के बीच की इस महीन रेखा को समझाते हुए ओशो कहते हैं कि मोह हमेशा असुरक्षा से पैदा होता है। मोह में भय होता है कि कहीं सामने वाला व्यक्ति हमें छोड़ न दे। इसी डर के कारण व्यक्ति दूसरे की स्वतंत्रता को सीमित करने लगता है। इसके विपरीत, वास्तविक प्रेम एक 'खिड़की' की तरह है जिससे खुला आसमान दिखता है। सच्चा प्रेम व्यक्ति को बांधता नहीं, बल्कि उसे और अधिक स्वतंत्र और जीवंत बनाता है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्रवासियों के संदर्भ में, जहां आधुनिक जीवनशैली के कारण रिश्तों में तनाव और अकेलेपन की समस्या आम हो रही है, ओशो का यह संदेश रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की प्रेरणा देता है। सत्य के साथ प्रेम के संबंध पर चर्चा करते हुए, ओशो बताते हैं कि प्रेम स्वयं में ही एक सत्य है जब वह निस्वार्थ हो। यदि प्रेम में कोई शर्त जुड़ी है, तो वह व्यापार बन जाता है। वह कहते हैं कि प्रेम कोई क्रिया नहीं बल्कि एक 'अवस्था' (State of Being) है। जब आप भीतर से आनंदित होते हैं, तो वह आनंद प्रेम के रूप में बाहर बहने लगता है। सिडनी और मेलबर्न जैसे व्यस्त शहरों में रहने वाले भारतीय समुदाय के सदस्यों के लिए, जो कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance) की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, प्रेम को एक आंतरिक विकास के रूप में देखना मानसिक शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। निष्कर्षतः, ओशो के अनुसार प्रेम तब सत्य बनता है जब वह मोह के अंधेरे से मुक्त होकर जागरूकता की रोशनी में आता है। मोह मांग करता है, जबकि प्रेम केवल देना जानता है। यदि प्रवासी समुदाय अपने सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक जीवन के बीच इस संतुलन को समझ ले, तो संबंधों की गरिमा और गहराई को पुनः प्राप्त किया जा सकता है। प्रेम को बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति का द्वार मानना ही ओशो के इस दर्शन का सार है।
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