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छात्रों में बढ़ती मोबाइल लत पर संसदीय समिति ने जताई चिंता; डिजिटल अंतराल पाटने और शिक्षा बजट बढ़ाने पर ज़ोर

ICN24 Newsroom 14 अग॰ 2026, 01:37 am
छात्रों में बढ़ती मोबाइल लत पर संसदीय समिति ने जताई चिंता; डिजिटल अंतराल पाटने और शिक्षा बजट बढ़ाने पर ज़ोर

संसदीय समिति ने छात्रों में मोबाइल की लत और साइबर सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। पैनल ने शिक्षा बजट को जीडीपी का 6% करने और डिजिटल असमानता को खत्म करने की सिफारिश की है।

भारत की एक संसदीय समिति ने स्कूली छात्रों के बीच मोबाइल फोन की बढ़ती लत और इंटरनेट के अत्यधिक उपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। शिक्षा, महिला, बच्चे, युवा और खेल संबंधी स्थायी समिति ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में शिक्षा मंत्रालय को सुझाव दिया है कि वह छात्रों और शिक्षकों के लिए साइबर सुरक्षा और मोबाइल एडिक्शन (लत) प्रबंधन पर विशेष पाठ्यक्रम शुरू करे। समिति का मानना है कि तकनीक जहां शिक्षा के लिए जरूरी है, वहीं इसका अनियंत्रित उपयोग छात्रों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। पैनल ने जोर देकर कहा कि डिजिटल साक्षरता केवल गैजेट चलाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग की समझ भी शामिल होनी चाहिए। समिति ने सिफारिश की है कि स्कूलों में ऐसे परामर्श सत्र आयोजित किए जाएं जो छात्रों को तकनीक के रचनात्मक उपयोग और इसके खतरों के बीच अंतर समझा सकें। इसके अतिरिक्त, शिक्षकों को भी प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है ताकि वे छात्रों में बदल रहे व्यवहारिक लक्षणों की पहचान कर सकें और समय रहते हस्तक्षेप कर सकें। मोबाइल लत के साथ-साथ, समिति ने भारत में मौजूद 'डिजिटल डिवाइड' यानी डिजिटल अंतराल के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच इंटरनेट पहुंच और उपकरणों की उपलब्धता में भारी अंतर है। कोविड-19 महामारी के दौरान यह अंतर स्पष्ट रूप से देखा गया था, जब कई छात्र संसाधनों के अभाव में ऑनलाइन शिक्षा से वंचित रह गए थे। पैनल ने मंत्रालय से आग्रह किया है कि बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए ताकि हाशिए पर रहने वाले छात्रों को भी समान अवसर मिल सकें। शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता में सुधार के लिए समिति ने सार्वजनिक शिक्षा खर्च को धीरे-धीरे बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित करने का सुझाव दिया है। यह मांग दशकों से की जा रही है, लेकिन वर्तमान में यह आंकड़ा इस लक्ष्य से काफी पीछे है। इसके साथ ही, माध्यमिक स्तर पर छात्रों के स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की उच्च दर पर भी चिंता जताई गई है। समिति का मानना है कि जब तक वित्तीय निवेश नहीं बढ़ाया जाता और स्थानीय स्तर पर सुविधाओं में सुधार नहीं होता, तब तक ड्रॉपआउट दर को कम करना चुनौतीपूर्ण होगा। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह रिपोर्ट विशेष महत्व रखती है। ऑस्ट्रेलिया के कई राज्यों, जैसे न्यू साउथ वेल्स और विक्टोरिया में स्कूलों के भीतर मोबाइल फोन के उपयोग पर पहले ही प्रतिबंध या सख्त नियम लागू किए जा चुके हैं। भारतीय मूल के माता-पिता, जो अक्सर अपने बच्चों की शिक्षा और डिजिटल सुरक्षा को लेकर जागरूक रहते हैं, भारत में हो रहे इन नीतिगत बदलावों को एक सकारात्मक कदम के रूप में देख रहे हैं। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि स्क्रीन टाइम और डिजिटल सुरक्षा की चुनौती वैश्विक है और इसके समाधान के लिए संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता है।
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