राजनीति
भारत को 'जनसंख्या विस्फोट' के डर से बाहर निकलना चाहिए: विशेषज्ञ पूनम मुत्तरेजा ने दी सलाह
ICN24 Newsroom 11 जुल॰ 2026, 02:31 pm
भारत की प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन स्तर से नीचे गिरने के बाद, विशेषज्ञों का कहना है कि अब ध्यान जनसंख्या नियंत्रण के बजाय शिक्षा और कौशल विकास पर होना चाहिए।
भारत में लंबे समय से चली आ रही 'जनसंख्या विस्फोट' की चिंता अब पुरानी बात होती जा रही है। पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (PFI) की कार्यकारी निदेशक पूनम मुत्तरेजा के अनुसार, भारत के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती जनसंख्या की वृद्धि नहीं, बल्कि अपनी विशाल जनसांख्यिकी का सही प्रबंधन करना है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) अब प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे गिर गई है, जिसका अर्थ है कि देश की जनसंख्या अब स्वाभाविक रूप से स्थिर होने की ओर अग्रसर है।
टाइम्स नाउ डिजिटल के साथ बातचीत में मुत्तरेजा ने स्पष्ट किया कि भारत को अब जनसंख्या के आंकड़ों को लेकर घबराने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब समय आ गया है जब भारत 'जनसंख्या की चिंता' (Population Anxiety) को पीछे छोड़कर मानव संसाधन के विकास पर ध्यान केंद्रित करे। उनके अनुसार, दक्षिण भारत के राज्यों ने पहले ही प्रजनन दर में भारी गिरावट दर्ज की है, जबकि उत्तर भारत के राज्य भी अब इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। यह बदलाव किसी सख्त कानून के कारण नहीं, बल्कि शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और महिलाओं के बीच बढ़ती जागरूकता के कारण आया है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है। भारत वर्तमान में दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है, और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अपनी श्रम शक्ति की जरूरतों के लिए भारतीय प्रवासियों पर बहुत अधिक निर्भर हैं। यदि भारत अपनी इस युवा आबादी को सही शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने में सफल रहता है, तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक स्तर पर, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए एक 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकीय लाभांश) साबित होगा।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि भारत अपनी महिला कार्यबल की भागीदारी (Female Labour Force Participation) बढ़ाने में विफल रहता है, तो वह इस सुनहरे अवसर को खो सकता है। मुत्तरेजा के अनुसार, भारत को चीन जैसे देशों से सबक लेना चाहिए, जहाँ जनसंख्या नियंत्रण की सख्त नीतियों के कारण अब तेजी से बुजुर्ग होती आबादी की समस्या पैदा हो गई है। भारत को अपनी नीतियों में लचीलापन रखना होगा और युवाओं को रोजगारपरक बनाने के लिए निवेश बढ़ाना होगा।
निष्कर्षतः, भारत के लिए अब चुनौती अधिक लोगों की नहीं, बल्कि 'सक्षम लोगों' की है। भविष्य की राजनीति और अर्थव्यवस्था इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपने युवाओं को कितना कुशल बनाता है और कैसे वह अपनी बदलती जनसांख्यिकी के साथ तालमेल बिठाता है।
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