राजनीति
छत्तीसगढ़ में 'पति-राज' पर पाबंदी: साय सरकार ने महिला प्रतिनिधियों के परिजनों के दखल पर लगाई रोक
ICN24 Newsroom 11 अग॰ 2026, 02:37 am
छत्तीसगढ़ की साय सरकार ने निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों या परिजनों द्वारा काम करने की प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार ने त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और कड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने आधिकारिक तौर पर उन निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के पारिवारिक सदस्यों पर रोक लगा दी है, जो अपनी पत्नियों, माताओं या बहनों के स्थान पर 'प्रतिनिधि' बनकर सरकारी बैठकों और प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप करते थे। यह निर्णय ग्रामीण राजनीति में लंबे समय से चली आ रही 'पति-राज' या 'सरपंच-पति' की संस्कृति को समाप्त करने के उद्देश्य से लिया गया है।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायत की बैठकों में केवल निर्वाचित महिला प्रतिनिधि ही उपस्थित रहेंगी। यदि कोई पुरुष रिश्तेदार—चाहे वह पति हो, पिता हो या भाई—उनकी जगह बैठक में शामिल होने या सरकारी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने की कोशिश करता है, तो इसे कानून का उल्लंघन माना जाएगा। सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि आधिकारिक कार्यक्रमों और कार्यालयों में महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिजनों के नाम की नेमप्लेट या उनके द्वारा बैठकों के संचालन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
भारत के संविधान के 73वें संशोधन ने पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी, ताकि जमीनी स्तर पर नेतृत्व में महिलाओं की भूमिका बढ़े। हालांकि, व्यावहारिक रूप से कई राज्यों में यह देखा गया कि महिलाएं केवल नाममात्र की प्रतिनिधि बनी रहीं और सत्ता की चाबी उनके घर के पुरुषों के पास ही रही। छत्तीसगढ़ सरकार का यह हालिया फैसला इस संरचनात्मक खामी को दूर करने की एक गंभीर कोशिश है। जानकारों का मानना है कि इस प्रतिबंध के लागू होने से न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि ग्रामीण महिलाओं में आत्मविश्वास और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का भी विकास होगा।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है। ऑस्ट्रेलिया की स्थानीय सरकारों (लोकल काउंसिल्स) में भारतीय मूल के कई प्रतिनिधि सक्रिय हैं, जहाँ जवाबदेही और व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व के कड़े मानक हैं। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय हमेशा से भारत में प्रशासनिक सुधारों और लैंगिक समानता का समर्थक रहा है। वहां की स्थानीय शासन प्रणाली में जिस तरह की स्वायत्तता और नियमों का पालन होता है, छत्तीसगढ़ सरकार का यह कदम उसी वैश्विक लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप दिखाई देता है।
प्रशासन ने जिला कलेक्टरों और मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (CEO) को इस आदेश का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि कोई अधिकारी ऐसे 'प्रतिनिधियों' को बैठकों में शामिल होने की अनुमति देता है, तो उस अधिकारी के विरुद्ध भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। यह कदम छत्तीसगढ़ में महिला सशक्तीकरण के नारे को धरातल पर उतारने और लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
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