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पश्चिम एशिया संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर: आरबीआई की एमपीसी बैठक में छाई रही भू-राजनीतिक तनाव की चिंता
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 02:11 pm

आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की हालिया बैठक में पश्चिम एशिया के संघर्ष को वैश्विक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बताया गया है, जिससे भारत में महंगाई और तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की हालिया बैठक के मिनटों से यह स्पष्ट हो गया है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारतीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। बैठक के दौरान, समिति के सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) में व्यवधान पैदा हो सकता है, जिससे भारत की मुद्रास्फीति (महंगाई) को नियंत्रित करने की कोशिशों को झटका लग सकता है।
आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने बैठक में कहा कि हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, लेकिन बाहरी झटकों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से न केवल ऊर्जा सुरक्षा को खतरा है, बल्कि यह वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता भी पैदा करता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में वहां किसी भी तरह की अशांति का सीधा असर घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों और परिवहन लागत पर पड़ता है, जो अंततः खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ा सकती है।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण है। जब भारत में मुद्रास्फीति बढ़ती है या आरबीआई ब्याज दरों को स्थिर रखता है, तो इसका सीधा असर भारतीय रुपये (INR) की विनिमय दर पर पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया से भारत पैसे भेजने वाले प्रवासियों (Remittance) के लिए विनिमय दर में उतार-चढ़ाव उनके निवेश और परिवार की वित्तीय सहायता को प्रभावित करता है। इसके अलावा, वैश्विक अनिश्चितता के कारण शेयर बाजारों में आने वाली गिरावट का असर उन एनआरआई (NRI) पर भी पड़ता है जिन्होंने भारतीय इक्विटी बाजारों में निवेश किया हुआ है।
एमपीसी सदस्यों ने यह भी उल्लेख किया कि विकसित देशों में 'लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें' (Higher for longer) रहने की संभावना बनी हुई है। यदि पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक महंगाई बढ़ती है, तो ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों के केंद्रीय बैंक भी अपनी ब्याज दरों को ऊंचा रख सकते हैं। इससे वैश्विक तरलता (Liquidity) प्रभावित होगी, जो उभरते बाजारों जैसे भारत के लिए विदेशी निवेश की राह कठिन बना सकती है।
निष्कर्ष के तौर पर, आरबीआई की एमपीसी ने 'सतर्कता' का रुख अपनाया है। समिति का मानना है कि जब तक मुद्रास्फीति स्थायी रूप से 4 प्रतिशत के लक्ष्य के करीब नहीं आ जाती और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात स्थिर नहीं हो जाते, तब तक नीतिगत रुख में किसी बड़े बदलाव की गुंजाइश कम है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए, यह समय अपने वित्तीय नियोजन और निवेश पोर्टफोलियो पर पैनी नजर रखने का है, क्योंकि वैश्विक संघर्षों की गूंज घरेलू बाजारों में स्पष्ट रूप से सुनाई दे रही है।
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