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अमेरिकी फेडरल जज का बड़ा फैसला: ट्रंप द्वारा लगाया गया 1 लाख डॉलर का H-1B वीजा शुल्क रद्द

ICN24 Newsroom 9 जून 2026, 08:00 am
अमेरिकी फेडरल जज का बड़ा फैसला: ट्रंप द्वारा लगाया गया 1 लाख डॉलर का H-1B वीजा शुल्क रद्द

अमेरिका की एक संघीय अदालत ने H-1B वीजा पर लगाए गए 1 लाख डॉलर के भारी-भरकम शुल्क को अवैध करार देते हुए इसे रद्द कर दिया है।

अमेरिका में एक संघीय न्यायाधीश ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा H-1B वीजा आवेदनों पर लगाए गए 1,00,000 डॉलर के शुल्क को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस तरह का भारी-भरकम शुल्क लगाना वास्तव में एक 'टैक्स' की श्रेणी में आता है, जिसके लिए अमेरिकी कांग्रेस (संसद) की मंजूरी अनिवार्य थी। इस फैसले से उन हजारों कुशल पेशेवरों, विशेषकर भारतीय आईटी विशेषज्ञों को बड़ी राहत मिली है, जो अमेरिकी कंपनियों में काम करने के इच्छुक हैं। मैसाचुसेट्स के बोस्टन में अमेरिकी जिला अदालत के न्यायाधीश लियो सोरोकिन ने सोमवार को यह फैसला सुनाया। न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि यह नीति संसद द्वारा आवश्यक शक्तियों के बिना ही H-1B याचिकाओं पर कर थोपती है। अदालत ने माना कि प्रशासन ने इस शुल्क को लागू करते समय अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। मूल रूप से, यह शुल्क पिछले साल एक प्रोकलामेशन के जरिए लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य अमेरिकी कंपनियों को विदेशी प्रतिभाओं के बजाय स्थानीय अमेरिकियों को नियुक्त करने के लिए प्रेरित करना बताया गया था। H-1B वीजा कार्यक्रम अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण जरिया है, जिसके माध्यम से वे दुनिया भर से कुशल प्रतिभाओं को नियुक्त करती हैं। भारतीय पेशेवर, जिनमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर और चिकित्सक शामिल हैं, इस वीजा श्रेणी के सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक हैं। ट्रंप प्रशासन के इस आदेश के बाद उद्योग जगत और भारतीय समुदाय के बीच वीजा सुधारों और नई कठोर शर्तों को लेकर गहरी अनिश्चितता पैदा हो गई थी। 20 राज्यों के एक समूह ने इस नीति के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि यह शुल्क लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है। जज सोरोकिन ने लिखा कि इस भुगतान का स्वरूप और आवेदन यह स्पष्ट करता है कि यह एक कर (टैक्स) है, चाहे इसे किसी भी नाम से पुकारा जाए। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाल ही में होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने सीनेट पैनल को बताया था कि वित्तीय वर्ष 2026 में फास्ट-ट्रैक प्रोसेसिंग के लिए बड़ी संख्या में आवेदकों ने इस भारी राशि का भुगतान किया था। अब अदालत के इस रुख के बाद आव्रजन नीतियों में पारदर्शिता और विधायी प्रक्रिया के महत्व पर फिर से मुहर लग गई है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के समुदायों के लिए भी यह खबर महत्वपूर्ण है। कई भारतीय पेशेवर जो वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया में कार्यरत हैं, अक्सर भविष्य में करियर की संभावनाओं के लिए अमेरिका की ओर देखते हैं। अमेरिकी वीजा नियमों में इस तरह की अस्थिरता वैश्विक स्तर पर प्रतिभाओं के आवागमन को प्रभावित करती है। इस कानूनी जीत ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि भविष्य में कोई भी प्रशासन विधायी प्रक्रिया को दरकिनार कर इस तरह के वित्तीय बोझ नहीं डाल सकेगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने की राह सुगम बनी रहेगी।
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