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भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौते पर पॉलीन हैनसन के तीखे तेवर; अल्बनीज सरकार की 'दोहरी नीति' पर उठाए सवाल
ICN24 Admin 12 जुल॰ 2026, 09:36 am

वन नेशन की नेता पॉलीन हैनसन ने भारत के साथ हुए नए यूरेनियम समझौते को लेकर सरकार की आलोचना की है। उन्होंने घरेलू स्तर पर परमाणु ऊर्जा पर प्रतिबंध और निर्यात को विरोधाभासी बताया।
वन नेशन पार्टी की नेता पॉलीन हैनसन ने भारत के साथ ऑस्ट्रेलिया के नए यूरेनियम निर्यात समझौते को लेकर एंथनी अल्बनीज के नेतृत्व वाली संघीय सरकार पर तीखा हमला बोला है। हैनसन का तर्क है कि यह नीति ऑस्ट्रेलिया की ऊर्जा रणनीति में एक बड़े विरोधाभास और 'दोहरे मापदंड' को उजागर करती है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ऑस्ट्रेलिया अपने देश के भीतर परमाणु ऊर्जा उत्पादन पर कड़ा प्रतिबंध लगाए हुए है, तो वह भारत को अपने नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के विस्तार के लिए यूरेनियम की आपूर्ति क्यों कर रहा है।
यह विवाद मेलबर्न में आयोजित ऑस्ट्रेलिया-भारत नेताओं के शिखर सम्मेलन के बाद शुरू हुआ, जहाँ प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक व्यापक ऊर्जा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस ऐतिहासिक समझौते का उद्देश्य यूरेनियम निर्यात, स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करना है। हालांकि, इस कूटनीतिक जीत के बीच हैनसन ने घरेलू ऊर्जा संकट और बढ़ती कीमतों का हवाला देते हुए सरकार को घेरा है।
पॉलीन हैनसन ने एक बयान में कहा कि ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडारों में से एक होने के बावजूद अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इसका उपयोग नहीं कर पा रहा है। उन्होंने कहा, "यह समझ से परे है कि हम अन्य देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए संसाधन बेच रहे हैं, लेकिन अपने ही नागरिकों को उसी तकनीक से सस्ती बिजली देने से इनकार कर रहे हैं।" हैनसन के अनुसार, यदि यूरेनियम भारत के लिए 'स्वच्छ और सुरक्षित' है, तो वह ऑस्ट्रेलिया के लिए क्यों नहीं हो सकता? उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाहवाही बटोरने के लिए ऑस्ट्रेलिया के अपने हितों की अनदेखी कर रही है।
दूसरी ओर, अल्बनीज सरकार ने इस समझौते का पुरजोर बचाव किया है। सरकार का कहना है कि यह समझौता ऑस्ट्रेलिया के संसाधन क्षेत्र के लिए अत्यंत लाभकारी है और यह भारत को उसके दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करेगा। सरकारी प्रवक्ताओं के अनुसार, भारत के साथ यह सहयोग शांतिपूर्ण नागरिक परमाणु ऊर्जा के उपयोग के लिए है और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के दायरे में आता है। लेबर सरकार का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया में परमाणु ऊर्जा का निर्माण वर्तमान में आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है और इसमें काफी समय लगेगा, जबकि भारत जैसे देशों में यह पहले से ही उनकी ऊर्जा नीति का एक प्रमुख हिस्सा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि हैनसन की यह टिप्पणी ऑस्ट्रेलिया में परमाणु ऊर्जा को लेकर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा है। जहाँ विपक्षी गठबंधन (कोअलिशन) ऑस्ट्रेलिया में परमाणु रिएक्टरों की स्थापना का समर्थन कर रहा है, वहीं लेबर सरकार और ग्रीन्स पार्टी इसके सख्त खिलाफ हैं। भारत के साथ हुआ यह नया समझौता अब इस बहस में एक नया मुद्दा बन गया है, जो आने वाले समय में चुनावी राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए, यह समझौता उसकी बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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