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नाटो शिखर सम्मेलन: ट्रंप के बदले तेवर, तीखी आलोचना के बाद एकता और सहयोग पर दिया जोर

ICN24 Newsroom 9 जुल॰ 2026, 04:31 am
नाटो शिखर सम्मेलन: ट्रंप के बदले तेवर, तीखी आलोचना के बाद एकता और सहयोग पर दिया जोर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो शिखर सम्मेलन के अंत में गठबंधन की सराहना करते हुए इसे 'एकता और प्रेम' की बैठक बताया, जिससे वैश्विक भू-राजनीति में राहत महसूस की गई।

ब्रसेल्स में आयोजित नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन का समापन एक अप्रत्याशित मोड़ के साथ हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने सम्मेलन की शुरुआत सदस्य देशों पर तीखे हमलों और रक्षा बजट को लेकर कड़ी चेतावनी के साथ की थी, समापन सत्र तक पूरी तरह से बदले हुए नजर आए। ट्रंप ने शिखर सम्मेलन के अंत में पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "यह एक शानदार बैठक थी, उस कमरे में बहुत प्यार और बहुत एकता थी।" राष्ट्रपति का यह बयान उन कड़वे बयानों के बिल्कुल विपरीत था, जो उन्होंने पिछले दो दिनों में जर्मनी और अन्य यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ दिए थे। शिखर सम्मेलन के दौरान मुख्य विवाद का विषय रक्षा खर्च रहा है। ट्रंप लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं कि अमेरिका नाटो के बजट का बड़ा हिस्सा वहन करता है, जबकि अन्य देश अपनी जीडीपी का 2 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने के लक्ष्य को पूरा नहीं कर रहे हैं। सम्मेलन के शुरुआती घंटों में उन्होंने जर्मनी को रूस का 'कैदी' तक कह दिया था। हालांकि, एक आपातकालीन सत्र के बाद ट्रंप ने दावा किया कि सहयोगियों ने अपने खर्च में तेजी लाने पर सहमति व्यक्त की है। उन्होंने इसे एक बड़ी जीत बताते हुए कहा कि नाटो अब पहले से कहीं अधिक मजबूत और एकजुट है। भारत-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के लिए यह घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण है। हालांकि भारत नाटो का सदस्य नहीं है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी (Major Non-NATO Ally) है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा समीकरणों को देखते हुए, नाटो के भीतर किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक सुरक्षा संरचना पर पड़ता है। यदि अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगियों से पीछे हटता है, तो इससे चीन और रूस जैसे देशों को क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल सकता है, जो ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों की रणनीतिक चिंताओं का विषय है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की शैली अक्सर 'दबाव बनाकर समझौता' करने की रही है। उन्होंने सहयोगियों को डराकर अधिक योगदान देने के लिए मजबूर किया और फिर एक सफल नेता के रूप में उभरने के लिए शांति का संदेश दिया। हालांकि, कई यूरोपीय देशों ने आधिकारिक तौर पर खर्च में किसी बड़े तत्काल बदलाव की पुष्टि नहीं की है, लेकिन उन्होंने सामूहिक रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। इस शिखर सम्मेलन के परिणामों का असर आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल के लिए, ट्रंप के नरम रुख ने उन अटकलों पर विराम लगा दिया है कि अमेरिका नाटो से बाहर निकल सकता है। ऑस्ट्रेलियाई कूटनीतिज्ञों और प्रवासी भारतीयों के लिए, जो एक स्थिर वैश्विक व्यवस्था के पक्षधर हैं, यह संदेश राहत देने वाला है कि पश्चिमी गठबंधन के भीतर दरारें भरने की कोशिश की जा रही है। राष्ट्रपति ट्रंप ने अंततः स्वीकार किया कि नाटो की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी शीत युद्ध के दौरान थी।
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