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ईरान युद्ध में शामिल होने से इनकार के बाद ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यास कम करने के दिए निर्देश

ICN24 Newsroom 17 अग॰ 2026, 11:37 am
ईरान युद्ध में शामिल होने से इनकार के बाद ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यास कम करने के दिए निर्देश

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यासों में कटौती का आदेश दिया है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक की स्थिरता के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

वॉशिंगटन और सियोल के बीच रक्षा संबंधों में आए एक बड़े मोड़ के रूप में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यासों में भारी कटौती करने का निर्देश दिया है। यह फैसला तब आया है जब दक्षिण कोरिया ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी गठबंधन का हिस्सा बनने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। इस कदम को न केवल एक कूटनीतिक दबाव के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार, यह निर्देश 'उल्ची फ्रीडम शील्ड' (Ulchi Freedom Shield) सैन्य अभ्यास शुरू होने से कुछ ही दिन पहले आया है। यह अभ्यास दक्षिण कोरिया की रक्षा तैयारियों और उत्तर कोरिया की ओर से आने वाले खतरों को रोकने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। अमेरिकी प्रशासन के इस फैसले से सियोल में चिंता की लहर है, क्योंकि नियमित सैन्य अभ्यासों में कमी आने से उत्तर कोरियाई शासन को अपनी उकसावे वाली गतिविधियों को बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। इस घटनाक्रम का प्रभाव केवल कोरियाई प्रायद्वीप तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय और नीति विश्लेषकों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण खबर है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों के लिए रणनीतिक प्राथमिकता है। दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग में किसी भी प्रकार की कमी इस क्षेत्र में चीन और उत्तर कोरिया के प्रभाव को अनियंत्रित कर सकती है, जिससे व्यापारिक मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है। ऑस्ट्रेलिया, जो क्वाड (QUAD) का एक प्रमुख सदस्य है, इस क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति को स्थिरता का एक स्तंभ मानता है। पेंटागन को मिले आदेशों में स्पष्ट किया गया है कि संसाधनों और रणनीतिक ध्यान को उन सहयोगियों की ओर मोड़ा जाएगा जो अमेरिकी विदेश नीति के लक्ष्यों के साथ पूर्णतः संरेखित हैं। दक्षिण कोरियाई सरकार ने अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन जानकारों का मानना है कि सियोल के लिए यह एक कठिन स्थिति है। ईरान के साथ अपने आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को देखते हुए सियोल ने युद्ध में शामिल न होने का फैसला किया था, लेकिन अब उसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अमेरिकी प्रतिबद्धता में कमी का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का तर्क है कि इस तरह के 'लेन-देन आधारित' (transactional) विदेशी संबंधों से अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों के बीच अविश्वास की भावना पैदा हो सकती है। यदि दक्षिण कोरिया की सैन्य क्षमताएं कमजोर होती हैं, तो इसका सीधा असर एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सामूहिक सुरक्षा पर पड़ेगा। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्रवासियों के लिए, जो भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ते रक्षा संबंधों पर नजर रखते हैं, यह घटनाक्रम भविष्य की अमेरिकी नीतियों का एक संकेत हो सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सियोल अपनी रक्षा रणनीति में बदलाव करेगा या वाशिंगटन के साथ संबंधों को सुधारने के लिए कोई नया रास्ता खोजेगा।
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