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मऊ: 'वंदे मातरम' के उद्घोष से गूंजा शहर, सांस्कृतिक गौरव और देशभक्ति का दिखा अद्भुत संगम
ICN24 Newsroom 17 अग॰ 2026, 08:38 am

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम के दौरान 'वंदे मातरम' के स्वरों ने वातावरण को देशभक्ति के रंग में रंग दिया, जिसकी गूंज सात समंदर पार भी सुनाई दे रही है।
उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद में हाल ही में आयोजित एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम ने न केवल स्थानीय निवासियों को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि राष्ट्रीय गौरव की एक नई लहर पैदा कर दी है। 'वंदे मातरम... सुजलां सुफलाम मलयजशीतलाम' के पावन स्वरों के साथ शुरू हुए इस आयोजन ने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और जल-थल की महत्ता को रेखांकित किया। यह गीत, जो दशकों से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा रहा है, आज भी आधुनिक भारत में उतनी ही प्रासंगिकता रखता है।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने रेखांकित किया कि बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत केवल एक गान नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति समर्पण का संकल्प है। 'सुजलां' अर्थात स्वच्छ जल से परिपूर्ण और 'सुफलाम' अर्थात मीठे फलों से लदी धरती का वर्णन करते हुए, यह गीत हमें पर्यावरण संरक्षण और अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम की याद दिलाता है। मऊ में आयोजित इस सभा में युवाओं की भारी भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ी हुई है।
दिलचस्प बात यह है कि इस तरह के आयोजनों की गूंज केवल भारत तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी, मेलबर्न और ब्रिस्बेन जैसे शहरों में रहने वाला भारतीय समुदाय भी अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए ऐसे ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लेता है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई नागरिक अक्सर स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस के अवसर पर फेडरेशन स्क्वायर जैसे प्रमुख स्थानों पर 'वंदे मातरम' का गायन करते हैं। मऊ में हुई यह हलचल प्रवासी भारतीयों के लिए भी एक भावनात्मक संदेश है कि उनकी मिट्टी की खुशबू और वहां का उत्साह आज भी बरकरार है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 'वंदे मातरम' के 'मलयजशीतलाम' जैसे शब्द, जो मलय पर्वत की ठंडी हवाओं का वर्णन करते हैं, भारत की भौगोलिक विविधता का प्रतीक हैं। मऊ जैसे छोटे शहरों से उठने वाली यह आवाजें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सॉफ्ट पावर को मजबूत करती हैं। जब एक प्रवासी भारतीय मेलबर्न की सड़कों पर यह गीत सुनता है, तो उसे अपनी मातृभूमि की नदियों और पहाड़ों की याद आती है।
इस आयोजन ने स्थानीय प्रशासन और नागरिक समाज के बीच एक सेतु का काम किया है। कार्यक्रम का समापन सामूहिक राष्ट्रगान और तिरंगे के सम्मान के साथ हुआ। मऊ की इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक प्रेम की भावना भौगोलिक सीमाओं को पार कर वैश्विक मंच पर भारतीयों को एकजुट करती है। आईएनसी24 (ICN24) के माध्यम से हम दुनिया भर में फैले भारतीय समुदाय तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं कि भारत की धड़कन आज भी इन्ही सांस्कृतिक मूल्यों में बसती है।
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