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'इस्लामिक नाटो' और 1965 की जंग: बगदाद पैक्ट जिसने ऐन वक्त पर तोड़ा पाकिस्तान का भरोसा

ICN24 Newsroom 12 अग॰ 2026, 04:37 pm
'इस्लामिक नाटो' और 1965 की जंग: बगदाद पैक्ट जिसने ऐन वक्त पर तोड़ा पाकिस्तान का भरोसा

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान बगदाद पैक्ट की विफलता ने दक्षिण एशिया की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। जानें कैसे 'इस्लामिक नाटो' का भ्रम टूटा।

6 सितंबर 1965 की वह तारीख भारतीय सैन्य इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी। जब भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर पश्चिमी पाकिस्तान में मोर्चा खोला, तो युद्ध केवल कश्मीर तक सीमित नहीं रहा। भारतीय टैंक लाहौर की ओर बढ़ रहे थे और पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के पास कोई ठोस जवाब नहीं था। उस संकट की घड़ी में तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान को अपने उन 'दोस्तों' की याद आई, जिनके साथ पाकिस्तान ने रक्षा समझौते किए थे। पाकिस्तान को पूरा भरोसा था कि 'बगदाद पैक्ट' के उसके साथी देश भारत के खिलाफ युद्ध में उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे। लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली और पाकिस्तान का यह भ्रम बहुत बुरी तरह से टूटा। बगदाद पैक्ट, जिसे बाद में 'सेंटो' (CENTO) के नाम से जाना गया, को अक्सर उस समय का 'इस्लामिक नाटो' कहा जाता था। 1955 में गठित इस गठबंधन में ईरान, इराक, तुर्की, पाकिस्तान और यूनाइटेड किंगडम शामिल थे। पाकिस्तान का मुख्य उद्देश्य इस संधि में शामिल होकर अपनी सुरक्षा को भारत के खिलाफ मजबूत करना था। पाकिस्तान को लगा था कि यदि भारत के साथ कभी युद्ध हुआ, तो यह समूह एक सैन्य ढाल के रूप में काम करेगा। हालांकि, इस संधि की बुनियाद किसी क्षेत्रीय संघर्ष पर नहीं, बल्कि शीत युद्ध (Cold War) की राजनीति पर टिकी थी। अमेरिका और ब्रिटेन का प्राथमिक लक्ष्य सोवियत संघ के प्रभाव को मध्य पूर्व में रोकना था, न कि भारत-पाकिस्तान के आपसी विवादों में उलझना। जब 1965 की जंग छिड़ी, तो पाकिस्तान ने तुरंत अपने सहयोगियों से सैन्य मदद की गुहार लगाई। लेकिन बगदाद पैक्ट के देशों ने इस युद्ध को 'दो पड़ोसियों का आपसी झगड़ा' बताकर पल्ला झाड़ लिया। ब्रिटेन और अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया कि संधि की शर्तें सोवियत आक्रमण की स्थिति में लागू होती हैं, किसी अन्य देश के खिलाफ नहीं। तुर्की और ईरान ने पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति तो जताई, लेकिन उन्होंने सैन्य रूप से युद्ध में उतरने से इनकार कर दिया। पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ा कूटनीतिक झटका था। उसे समझ आ गया कि जिस 'इस्लामिक नाटो' के भरोसे वह बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था, वह केवल कागजों तक ही सीमित था। इस विफलता के बाद बगदाद पैक्ट की प्रासंगिकता खत्म होने लगी। इराक पहले ही इस गठबंधन से बाहर निकल चुका था और 1979 की ईरानी क्रांति के बाद यह पूरी तरह से बिखर गया। भारत के लिए यह युद्ध न केवल सैन्य जीत थी, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी था कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन हमेशा संकट में काम नहीं आते। आज जब हम ऑस्ट्रेलिया में भारतीय समुदाय के परिप्रेक्ष्य से देखते हैं, तो यह इतिहास हमें भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) की महत्ता समझाता है। भारत ने हमेशा अपनी रक्षा के लिए स्वयं पर निर्भर रहने की नीति अपनाई है, जो आज के वैश्विक परिदृश्य में भी उतनी ही प्रासंगिक है।
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