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पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देकर पंडवानी को विश्व मंच पर ले गईं तीजन बाई: संघर्ष और सफलता की अनूठी गाथा

ICN24 Newsroom 6 जुल॰ 2026, 02:31 am
पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देकर पंडवानी को विश्व मंच पर ले गईं तीजन बाई: संघर्ष और सफलता की अनूठी गाथा

पंडवानी की कपालिक शैली को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली तीजन बाई की जीवन यात्रा लोक कला के प्रति अटूट समर्पण और सामाजिक बाधाओं को तोड़ने की एक प्रेरणादायक कहानी है।

छत्तीसगढ़ की माटी से उपजी लोक कला 'पंडवानी' को सात समंदर पार पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण तीजन बाई का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। दुर्ग जिले के एक छोटे से गांव गनियारी में 8 अगस्त 1956 को जन्मी तीजन बाई ने उस दौर में लोक कला के क्षेत्र में कदम रखा, जब महिलाओं का मंच पर प्रदर्शन करना सामाजिक वर्जनाओं के घेरे में था। उनकी सफलता की कहानी केवल कला की जीत नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक समाज में एक महिला के संघर्ष और विजय की गाथा है। तीजन बाई के कलात्मक सफर की शुरुआत उनके नाना बृजलाल पारधी से हुई। बचपन में नाना के मुख से महाभारत की कथाएं सुनते-सुनते उनके मन में पंडवानी के प्रति गहरा अनुराग पैदा हुआ। हालांकि, समाज की नजरों में यह केवल पुरुषों का क्षेत्र था। पारंपरिक रूप से पंडवानी की दो शैलियाँ होती हैं— वेदमती और कपालिक। वेदमती शैली में कलाकार बैठकर शांत भाव से कथा वाचन करता है, जिसे महिलाओं के लिए उपयुक्त माना जाता था। इसके विपरीत, कपालिक शैली में कलाकार खड़े होकर, हाथ में तंबूरा लेकर, अभिनय और नृत्य के माध्यम से कथा सुनाता है। तीजन बाई ने अपने स्वभाव के अनुरूप कठिन मानी जाने वाली कपालिक शैली को चुना। उनकी इस पसंद का समाज और परिवार ने कड़ा विरोध किया। उन्हें समाज से बहिष्कृत तक किया गया, लेकिन तीजन बाई ने हार नहीं मानी। उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से विधिवत प्रशिक्षण लिया और अपनी कला को निखारना जारी रखा। धीरे-धीरे उनकी ख्याति फैलने लगी। उनकी विशिष्ट गायन शैली, चेहरे के हाव-भाव और तंबूरे को कभी गदा तो कभी धनुष बना लेने की कला ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी आवाज में जो गमक और साहस था, उसने उन्हें पुरुषों के एकाधिकार वाले इस क्षेत्र में निर्विवाद नायक बना दिया। विश्व मंच पर उनकी प्रसिद्धि का द्वार तब खुला जब विख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी और तुर्की जैसे देशों में उन्होंने पंडवानी की गूंज सुनाई। भारत सरकार ने उनकी कला का सम्मान करते हुए उन्हें 1987 में पद्म श्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए तीजन बाई जैसी कलाकार एक प्रेरणास्रोत हैं। यहाँ का प्रवासी समाज अपनी अगली पीढ़ी को भारतीय जड़ों और लोक कलाओं से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है। तीजन बाई की कहानी हमें सिखाती है कि लोक कलाएं केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि हमारी पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अक्सर भारतीय लोक कलाओं की चर्चा होती है, जहाँ तीजन बाई के संघर्ष और सफलता को एक मिसाल के रूप में देखा जाता है। आज भी तीजन बाई अपनी उसी सादगी और ऊर्जा के साथ पंडवानी का झंडा बुलंद किए हुए हैं, जो दुनिया भर के कलाकारों के लिए एक मील का पत्थर है।
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