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'सर्वोच्च बलिदान': सुप्रीम कोर्ट ने शौर्य चक्र विजेता की विधवा को ₹10 लाख का अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया

ICN24 Newsroom 11 अग॰ 2026, 05:37 pm
'सर्वोच्च बलिदान': सुप्रीम कोर्ट ने शौर्य चक्र विजेता की विधवा को ₹10 लाख का अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने भारत-चीन सीमा पर शहीद हुए GREF कर्मी की विधवा को ₹10 लाख देने का निर्देश दिया है, कोर्ट ने इसे 'सर्वोच्च बलिदान' की मान्यता बताया।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानवीय निर्णय लेते हुए केंद्र सरकार को जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स (GREF) के एक दिवंगत कर्मचारी की विधवा को ₹10 लाख का अतिरिक्त अनुग्रह राशि (ex-gratia) देने का निर्देश दिया है। यह कर्मचारी भारत-चीन सीमा पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़क निर्माण के दौरान अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ था। मरणोपरांत उन्हें 'शौर्य चक्र' से सम्मानित किया गया था, जो शांतिकाल में दिया जाने वाला भारत का तीसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यद्यपि तकनीकी आधार पर कुछ लाभ रोके गए थे, लेकिन जब मामला देश की सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा के लिए दिए गए 'सर्वोच्च बलिदान' का हो, तो सरकार को उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि वह व्यक्ति सीमावर्ती क्षेत्रों की दुर्गम परिस्थितियों में राष्ट्र निर्माण का कार्य कर रहा था, जो सीधे तौर पर देश की रक्षा तैयारियों से जुड़ा है। यह मामला तब चर्चा में आया जब शहीद कर्मी की पत्नी ने उचित मुआवजे और पेंशन लाभों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। GREF, जो सीमा सड़क संगठन (BRO) के तहत कार्य करता है, अक्सर भारतीय सेना के साथ मिलकर दुर्गम क्षेत्रों में काम करता है। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि शौर्य चक्र विजेता का परिवार केवल कागजी नियमों के कारण सम्मानजनक जीवन से वंचित नहीं रहना चाहिए। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए यह आदेश जारी किया ताकि पूर्ण न्याय सुनिश्चित किया जा सके। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर विशेष महत्व रखती है। प्रवासी भारतीय अक्सर भारत की सीमाओं पर तैनात जवानों और कर्मियों के प्रति गहरा सम्मान रखते हैं। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय अक्सर सीमा सुरक्षा बलों और उनके परिवारों की सहायता के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से धन जुटाते हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख दर्शाता है कि देश अपने उन नायकों को नहीं भूलता जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में तिरंगे का मान रखा है। अदालत ने केंद्र सरकार को आठ सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन हजारों अर्धसैनिक बलों और सहायक कर्मचारियों के परिवारों के लिए एक मिसाल बनेगा जो अक्सर मुख्यधारा की सेना जैसी सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं, जबकि वे समान रूप से खतरनाक परिस्थितियों में सेवा करते हैं। यह निर्णय न केवल वित्तीय सहायता है, बल्कि उस बलिदान की न्यायिक स्वीकृति भी है जिसे लंबे समय से लंबित रखा गया था।
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