राजनीति
तमिलनाडु में गोहत्या पर प्रतिबंध के मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
ICN24 Newsroom 13 जुल॰ 2026, 08:31 pm

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी है जिसमें तमिलनाडु सरकार को राज्य में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को मद्रास उच्च न्यायालय के उस विवादास्पद आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें तमिलनाडु सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था कि राज्य में किसी भी गाय या बछड़े का वध न किया जाए। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया, जिसमें 27 मई के उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी।
शीर्ष अदालत का यह हस्तक्षेप तमिलनाडु सरकार के उस तर्क के बाद आया है जिसमें कहा गया था कि उच्च न्यायालय ने अपने न्यायिक दायरे से बाहर जाकर नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप किया है। राज्य सरकार ने अपनी दलील में स्पष्ट किया कि गोहत्या और पशु संरक्षण से जुड़े नियम पहले से ही 'तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958' के तहत विनियमित हैं। सरकार का मानना था कि उच्च न्यायालय का निर्देश न केवल मौजूदा कानूनों की अनदेखी करता है, बल्कि कार्यपालिका के अधिकारों का भी उल्लंघन करता है।
मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो मद्रास उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने राज्य में पशु क्रूरता और अवैध वध की शिकायतों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए यह निर्देश जारी किया था। अदालत ने तमिलनाडु सरकार को सख्त लहजे में कहा था कि वह राज्य भर में गोहत्या पर प्रभावी प्रतिबंध लागू करे। हालांकि, तमिलनाडु सरकार ने तुरंत उच्चतम न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि ऐसे संवेदनशील और सामाजिक-कानूनी मुद्दों पर फैसला लेना विधायिका का काम है, न कि न्यायपालिका का।
सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई तक उच्च न्यायालय के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। पीठ ने संकेत दिया कि अदालत को यह देखना होगा कि क्या उच्च न्यायालय के पास सरकार को इस तरह के विशिष्ट नीतिगत निर्देश देने का अधिकार है। भारत में पशु वध और धार्मिक भावनाओं से जुड़े कानून अक्सर कानूनी और राजनीतिक विवादों का केंद्र रहे हैं। तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहां भोजन की आदतें और कृषि पद्धतियां विविध हैं, इस तरह के अदालती आदेश व्यापक सामाजिक प्रभाव डालते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भारत के ऐसे न्यायिक निर्णय विशेष महत्व रखते हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले सात लाख से अधिक भारतीय मूल के लोग न केवल अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े हैं, बल्कि वे भारत में होने वाले संवैधानिक और कानूनी बदलावों को भी करीब से देखते हैं। प्रवासियों के बीच अक्सर भारत की धर्मनिरपेक्षता और राज्यों के स्वायत्त अधिकारों पर चर्चा होती है। सुप्रीम कोर्ट का यह हालिया आदेश इस बात को पुख्ता करता है कि नीति निर्धारण में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति का संतुलन कितना अनिवार्य है। यह फैसला आने वाले समय में अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर साबित हो सकता है जहां इसी तरह के कानूनी विवाद लंबित हैं।
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