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एक वीडियो ने बदली दिल्ली के सड़क पर रहने वाले बच्चों की किस्मत: 8 राज्यों से मिली किताब, राशन और उम्मीद की नई किरण

ICN24 Newsroom 13 जुल॰ 2026, 05:31 pm
एक वीडियो ने बदली दिल्ली के सड़क पर रहने वाले बच्चों की किस्मत: 8 राज्यों से मिली किताब, राशन और उम्मीद की नई किरण

दिल्ली के एक सरकारी शिक्षक कृष्ण कुमार की सड़क किनारे चलने वाली पाठशाला को सोशल मीडिया के जरिए देशभर से जबरदस्त समर्थन मिला है, जिससे अब दर्जनों बच्चों का भविष्य संवर रहा है।

राजधानी दिल्ली के शेख सराय इलाके में हर शाम सड़क किनारे एक अनोखी पाठशाला सजती है। यहाँ न तो स्कूल की कोई भव्य इमारत है, न डेस्क-बेंच और न ही पक्की दीवारें, लेकिन फिर भी यहाँ दर्जनों बच्चों की आँखों में भविष्य के सपने पल रहे हैं। यह कहानी है दिल्ली सरकार के एक समर्पित शिक्षक कृष्ण कुमार की, जिन्होंने अपने स्कूल की ड्यूटी के बाद अपना जीवन उन बच्चों को शिक्षित करने के लिए समर्पित कर दिया है, जो कभी सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर थे। हाल ही में 'द बेटर इंडिया' द्वारा कृष्ण कुमार के इस निस्वार्थ कार्य की कहानी साझा किए जाने के बाद, इसे 13 लाख से अधिक लोगों ने देखा। इस वीडियो का प्रभाव इतना व्यापक रहा कि भारत के आठ राज्यों—केरल, महाराष्ट्र (मुंबई), गुजरात (सूरत), राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली सहित अन्य क्षेत्रों—से मदद की लहर दौड़ पड़ी। लोगों ने न केवल इस पहल की सराहना की, बल्कि राशन किट, स्कूल की स्टेशनरी, कपड़े और खुले में रहने वाले परिवारों के लिए टेंट जैसी आवश्यक सामग्री भेजकर इन बच्चों के जीवन में नई आशा का संचार किया है। राजस्थान के हनुमानगढ़ से ताल्लुक रखने वाले कृष्ण कुमार का अपना जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है। बचपन में आर्थिक तंगी के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी, लेकिन अपनी कड़ी मेहनत और अटूट दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने न केवल अपनी शिक्षा पूरी की, बल्कि दिल्ली में सरकारी शिक्षक का पद भी हासिल किया। शेख सराय की सड़कों पर भीख मांगते बच्चों को देखकर उनका दिल पसीज गया। एक शाम जब एक छोटी बच्ची ने उनसे अपने भूखे पिता के लिए खाना मांगा, तो कृष्ण ने उसे भोजन के साथ-साथ एक किताब भी दी और उसे पढ़ाने का वादा किया। वही बच्ची उनकी पहली छात्रा बनी। शुरुआत में यह सफर आसान नहीं था। स्थानीय लोगों ने इस प्रयास को नजरअंदाज किया और बच्चों को भी पढ़ाई में रुचि नहीं थी। लेकिन कृष्ण कुमार ने हार नहीं मानी। आज उनके पास 50 से 60 बच्चे पढ़ने आते हैं, जिनमें से अधिकांश ने भीख मांगना छोड़ दिया है। वे अपनी जेब से इन बच्चों के लिए किताबें और अन्य जरूरी सामान खरीदते हैं। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए भी यह कहानी अत्यंत प्रेरणादायक है। प्रवासी भारतीय अक्सर भारत में जमीनी स्तर पर हो रहे सामाजिक बदलावों से जुड़ना चाहते हैं। कृष्ण कुमार जैसे शिक्षकों की यह पहल दिखाती है कि कैसे व्यक्तिगत स्तर पर किए गए छोटे-छोटे प्रयास एक बड़े सामाजिक बदलाव की नींव रख सकते हैं। कृष्ण कुमार का अब एक ही सपना है—इन बच्चों के लिए एक स्थाई स्कूल बनाना, जहाँ वे गरिमा और सुरक्षा के साथ अपनी शिक्षा जारी रख सकें। यह समर्थन केवल भौतिक सहायता नहीं है, बल्कि उस विश्वास की जीत है कि शिक्षा ही गरीबी के चक्र को तोड़ने का एकमात्र माध्यम है।
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