राजनीति
सुप्रीम कोर्ट की निजी अस्पतालों को कड़ी फटकार: 'कर्तव्य नहीं निभा सकते तो नाम के आगे डॉक्टर न लिखें'
ICN24 Newsroom 18 जुल॰ 2026, 11:34 am
सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों को चार साल की बलात्कार पीड़िता को समय पर इलाज न देने के लिए कड़ी फटकार लगाते हुए मुआवजे का आदेश दिया है।
भारत के उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों और उनके डॉक्टरों को कड़ी फटकार लगाई है। मामला एक चार साल की बलात्कार पीड़िता को समय पर चिकित्सा सहायता न देने से जुड़ा है, जिसकी इसी साल मार्च में दुखद मृत्यु हो गई थी। अदालत ने डॉक्टरों के रवैये पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि यदि वे अपना बुनियादी कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते, तो उन्हें अपने नाम के साथ 'डॉक्टर' शब्द का उपयोग नहीं करना चाहिए।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए दोनों अस्पतालों को पीड़िता के परिवार को उचित मुआवजा देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि जब मानवता और जीवन बचाने की बात आती है, तो प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं बाधा नहीं बननी चाहिए। बेंच ने टिप्पणी की, "यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक मासूम बच्ची को अस्पताल दर अस्पताल भटकना पड़ा और उसे वह उपचार नहीं मिला जो उसे तत्काल मिलना चाहिए था।"
यह घटना मार्च की है जब गाजियाबाद में एक चार साल की बच्ची के साथ जघन्य अपराध हुआ था। उसे गंभीर हालत में निजी अस्पतालों में ले जाया गया था, लेकिन कथित तौर पर अस्पतालों ने इलाज में देरी की या उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप न मिलने के कारण बच्ची ने दम तोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि डॉक्टरों का पहला धर्म जान बचाना है, न कि कागजी कार्रवाई या अन्य बहानों में समय गंवाना।
अदालत ने आगे कहा कि चिकित्सा के पेशे को समाज में भगवान का दर्जा दिया गया है, लेकिन ऐसे उदाहरण उस भरोसे को तोड़ते हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने निजी स्वास्थ्य संस्थानों की जवाबदेही पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल मुनाफे के लिए अस्पताल चलाना और संकट के समय जिम्मेदारी से पीछे हटना कतई स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य सेवा एक सेवा है, कोई केवल व्यावसायिक सौदा नहीं।
भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के संदर्भ में देखें तो यह फैसला काफी महत्वपूर्ण है। विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय (NRIs) अक्सर भारत में अपने परिवार के लिए बेहतर और सुरक्षित स्वास्थ्य व्यवस्था की उम्मीद करते हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसी स्वास्थ्य प्रणालियों में जहां 'ड्यूटी ऑफ केयर' (सेवा का कर्तव्य) को अत्यंत प्राथमिकता दी जाती है, वहां भारत के सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख एक सकारात्मक संदेश भेजता है। यह फैसला रेखांकित करता है कि भारत में भी अब चिकित्सा लापरवाही (medical negligence) के खिलाफ कानूनी शिकंजा कस रहा है और संस्थानों को उनके कार्यों के प्रति जवाबदेह ठहराया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आने वाले समय में निजी अस्पतालों के लिए सख्त गाइडलाइंस बनने की उम्मीद है, विशेषकर उन मामलों में जहां आपातकालीन उपचार की आवश्यकता होती है। अदालत ने राज्य सरकारों को भी निर्देश दिया है कि वे सुनिश्चित करें कि कोई भी अस्पताल गंभीर मामलों में इलाज देने से मना न करे।
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