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फ्रैक्चर होने पर क्या करें? मेयो क्लिनिक और रेड क्रॉस ने बताए जीवन रक्षक फर्स्ट एड उपाय
ICN24 Newsroom 18 जुल॰ 2026, 06:33 pm

हड्डी टूटने पर सही समय पर दी गई प्राथमिक चिकित्सा मरीज की स्थिति को बिगड़ने से बचा सकती है। जानिए मेयो क्लिनिक और रेड क्रॉस द्वारा सुझाए गए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश।
किसी भी दुर्घटना में हड्डी का टूटना या फ्रैक्चर होना एक दर्दनाक और तनावपूर्ण स्थिति होती है। चाहे वह घर के काम के दौरान हुई गिरावट हो, खेल के मैदान पर लगी चोट हो, या सड़क दुर्घटना, सही समय पर दी गई प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) न केवल मरीज के दर्द को कम कर सकती है, बल्कि भविष्य की जटिलताओं को भी रोक सकती है। मेयो क्लिनिक और अमेरिकन रेड क्रॉस जैसे वैश्विक स्वास्थ्य संस्थानों ने फ्रैक्चर की स्थिति में अपनाए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक कदमों की जानकारी साझा की है।
विशेषज्ञों के अनुसार, फ्रैक्चर होने पर सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है 'स्थिरता'। यदि आपको संदेह है कि हड्डी टूट गई है, तो प्रभावित हिस्से को हिलाने-डुलाने की कोशिश बिल्कुल न करें। यदि चोट गर्दन या पीठ में है, तो मरीज को तब तक न हिलाएं जब तक कि उनकी जान को कोई तत्काल खतरा न हो, क्योंकि गलत तरीके से हिलाना रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुँचा सकता है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह जानना आवश्यक है कि ऐसी किसी भी आपात स्थिति में तुरंत '000' पर कॉल करके एम्बुलेंस बुलानी चाहिए।
यदि घाव से खून बह रहा है, तो मेयो क्लिनिक के दिशा-निर्देशों के अनुसार, सबसे पहले रक्तस्राव को रोकना प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए किसी साफ कपड़े या स्टरलाइज्ड पट्टी से घाव पर हल्का दबाव डालें। ध्यान रहे कि यदि हड्डी त्वचा से बाहर निकली हुई दिख रही है, तो उसे वापस अंदर धकेलने की कोशिश कभी न करें।
दूसरा मुख्य कदम प्रभावित क्षेत्र को स्थिर करना है। रेड क्रॉस के अनुसार, यदि मेडिकल सहायता आने में देरी हो रही है, तो आप एक कामचलाऊ 'स्प्लिंट' (Splint) का उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए लकड़ी के टुकड़े, मुड़े हुए अखबार या मैगजीन को प्रभावित अंग के नीचे रखकर उसे पट्टी या कपड़े से हल्के से बांध दें। इसका उद्देश्य हड्डी के सिरों को आपस में रगड़ने या हिलने से रोकना है।
सूजन और दर्द को कम करने के लिए बर्फ का उपयोग बहुत प्रभावी होता है। चोट वाली जगह पर बर्फ के पैक को 15-20 मिनट के लिए लगाएं। याद रखें कि बर्फ को सीधे त्वचा पर न रखें; इसे हमेशा एक तौलिये या कपड़े में लपेटकर ही इस्तेमाल करें। इससे नसों में रक्त का प्रवाह थोड़ा धीमा होता है जिससे सूजन नियंत्रित रहती है।
अंत में, मरीज को 'शॉक' (Shock) से बचाना भी जरूरी है। फ्रैक्चर के कारण व्यक्ति बेहोश महसूस कर सकता है या उसकी सांसें तेज हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को लिटा दें और यदि संभव हो, तो उनके पैरों को सिर के स्तर से थोड़ा ऊपर उठा दें (बशर्ते पैरों में फ्रैक्चर न हो)। उन्हें कंबल से ढक दें ताकि शरीर का तापमान सामान्य बना रहे। इन प्राथमिक उपचारों के बाद, डॉक्टर द्वारा एक्स-रे और उचित उपचार अनिवार्य है।
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