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एम.एस. सुब्रमण बनाम तमिलनाडु मर्केंटाइल बैंक: DRAT चेन्नई ने ऋण वसूली प्रक्रिया पर सुनाया अहम फैसला
ICN24 Newsroom 14 जुल॰ 2026, 08:31 am

चेन्नई के ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) ने बैंक और कर्जदार के बीच विवाद में कानूनी प्रक्रियाओं के पालन पर जोर दिया है, जिसका असर प्रवासी भारतीयों की संपत्ति पर भी पड़ सकता है।
चेन्नई स्थित ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) ने हाल ही में एम.एस. सुब्रमण बनाम अधिकृत अधिकारी, तमिलनाडु मर्केंटाइल बैंक लिमिटेड मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। यह मामला न केवल बैंकिंग क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि उन प्रवासी भारतीयों (NRIs) के लिए भी विशेष मायने रखता है जिनकी भारत में अचल संपत्तियां हैं और जिन्होंने भारतीय बैंकों से ऋण ले रखा है। इस मामले की मुख्य जड़ बैंक द्वारा ऋण वसूली के लिए अपनाई गई प्रक्रियाओं और कर्जदार के अधिकारों के बीच का संतुलन है।
भारत में वित्तीय संपत्तियों के प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण और सुरक्षा हित प्रवर्तन (SARFAESI) अधिनियम, 2002 के तहत बैंकों को चूककर्ता कर्जदारों के खिलाफ कार्रवाई करने के व्यापक अधिकार दिए गए हैं। हालांकि, एम.एस. सुब्रमण के मामले में न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि इन अधिकारों का उपयोग करते समय बैंकों को निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करना अनिवार्य है। अक्सर यह देखा गया है कि बैंक ऋण वसूली की जल्दी में उचित नोटिस और नीलामी की प्रक्रियाओं में चूक कर देते हैं, जिसे अदालतें स्वीकार नहीं करतीं।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष रूप से प्रासंगिक है। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले कई भारतीय नागरिकों ने भारत में संपत्ति निवेश या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए ऋण ले रखे हैं। भौतिक रूप से भारत में उपस्थित न होने के कारण, कई बार NRI कर्जदारों को बैंक की कार्यवाही की समय पर सूचना नहीं मिल पाती। DRAT का यह रुख कि अधिकृत अधिकारियों को पारदर्शिता बरतनी चाहिए, दूर देशों में बैठे कर्जदारों को एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
मामले के विवरण के अनुसार, विवाद बैंक द्वारा संपत्ति को कब्जे में लेने और उसकी बिक्री के लिए जारी किए गए नोटिसों की वैधता के इर्द-गिर्द घूमता था। न्यायाधिकरण ने इस बात पर जोर दिया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना बैंक की जिम्मेदारी है। यदि बैंक किसी संपत्ति को नीलाम करने का निर्णय लेता है, तो उसे कर्जदार को अपनी बात रखने और ऋण चुकाने का उचित अवसर देना होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बनेगा जहां बैंक तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर कर्जदारों की संपत्तियों पर त्वरित कार्रवाई करने की कोशिश करते हैं। ICN24 के पाठकों के लिए सलाह है कि वे भारत में अपने ऋण खातों और बैंक संचार (ईमेल और व्हाट्सएप) को नियमित रूप से अपडेट रखें ताकि किसी भी कानूनी कार्यवाही की स्थिति में उन्हें समय रहते जानकारी मिल सके। यह फैसला याद दिलाता है कि कानून केवल ऋणदाता के पक्ष में नहीं है, बल्कि वह कर्जदार की मेहनत की कमाई से बनाई गई संपत्ति की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध है।
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