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महबूबा मुफ्ती के पेलेट गन वाले बयान पर बवाल, फिर छिड़ी कश्मीर की पुरानी बहस

ICN24 Newsroom 29 जुल॰ 2026, 05:36 pm
महबूबा मुफ्ती के पेलेट गन वाले बयान पर बवाल, फिर छिड़ी कश्मीर की पुरानी बहस

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर दिए गए हालिया बयान ने घाटी में एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर से 'पेलेट गन' का मुद्दा गरमा गया है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के एक हालिया बयान ने इस संवेदनशील विषय पर नई बहस छेड़ दी है। महबूबा मुफ्ती ने कथित तौर पर कुछ विशेष परिस्थितियों में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पेलेट-फायरिंग शॉटगन के इस्तेमाल का बचाव किया है। उनके इस रुख को कई राजनीतिक विश्लेषक और उनके विरोधी एक 'यू-टर्न' के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि मुफ्ती अतीत में इन हथियारों के इस्तेमाल की मुखर आलोचक रही हैं। पेलेट गन का मुद्दा कश्मीर में पिछले डेढ़ दशक से मानवाधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच के संघर्ष का प्रतीक रहा है। 2010 और विशेष रूप से 2016 के अशांत समय के दौरान, इन बंदूकों के इस्तेमाल से सैकड़ों प्रदर्शनकारियों की आंखों की रोशनी चली गई थी, जिससे स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी आक्रोश फैला था। रोचक तथ्य यह है कि 2016 में जब घाटी में व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, तब महबूबा मुफ्ती खुद राज्य की मुख्यमंत्री थीं और उस समय उन पर इन कठोर उपायों को रोकने में विफल रहने के आरोप लगे थे। विपक्ष, विशेष रूप से नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) ने महबूबा मुफ्ती के इस बयान को 'राजनीतिक अवसरवाद' करार दिया है। स्थानीय नेताओं का तर्क है कि जब मुफ्ती सत्ता में थीं, तब उन्होंने इन हथियारों को उचित ठहराने की कोशिश की और जब वे विपक्ष में रहीं, तो उन्होंने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया। अब उनके ताजा बयान ने कश्मीर के नागरिक समाज और उन परिवारों के जख्मों को फिर से कुरेद दिया है, जिन्होंने पेलेट गन की वजह से अपनों को खोया है या जो स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए हैं। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय और विशेष रूप से कश्मीरी प्रवासियों के लिए यह खबर काफी महत्व रखती है। सिडनी और मेलबर्न जैसे शहरों में कश्मीरी समुदाय अक्सर घाटी में मानवाधिकारों की स्थिति पर चर्चा करता रहता है। मुफ्ती का यह बयान प्रवासी भारतीयों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है, जो कश्मीर में शांति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की बहाली की उम्मीद लगाए बैठे हैं। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के विरोधाभासी बयान घाटी के युवाओं के बीच राजनीतिक नेतृत्व के प्रति विश्वास को और कम कर सकते हैं। इस पूरे विवाद के बीच, सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पेलेट गन का विकल्प तलाशना हमेशा से एक चुनौती रही है। हालांकि, केंद्र सरकार और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने हाल के वर्षों में अन्य 'गैर-घातक' (non-lethal) विकल्पों पर जोर दिया है, लेकिन पेलेट गन का साया अभी भी कश्मीर की चुनावी और सामाजिक राजनीति पर मंडरा रहा है। महबूबा मुफ्ती के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर में सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच का संतुलन आज भी एक जटिल मुद्दा बना हुआ है।
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