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भारत में शिक्षा की स्थिति: कक्षा 9 और 10 में स्कूल छोड़ने वाली छात्राओं की दर 8 प्रतिशत पहुंची
ICN24 Newsroom 29 जुल॰ 2026, 01:35 pm
केंद्र सरकार के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत में कक्षा 9 और 10 के बीच छात्राओं की ड्रॉपआउट दर चिंताजनक रूप से 8 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
भारत में माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर छात्राओं के स्कूल छोड़ने की बढ़ती दर ने नीति निर्माताओं के सामने गंभीर चुनौती पेश कर दी है। सरकार के आधिकारिक स्कूल डेटाबेस 'यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन' (UDISE) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, कक्षा 9 और 10 में छात्राओं की ड्रॉपआउट दर बढ़कर 8 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है। यह जानकारी केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर द्वारा पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में संसद में प्रस्तुत की।
आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर की तुलना में माध्यमिक स्तर पर लड़कियां अधिक संख्या में स्कूल छोड़ रही हैं। जहां प्राथमिक स्तर पर शिक्षा की निरंतरता बेहतर बनी हुई है, वहीं कक्षा 9 में आते ही यह संतुलन बिगड़ने लगता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वह आयु वर्ग है जहां किशोरियों को कई तरह की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
संसद में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत कक्षा 8 तक शिक्षा अनिवार्य होने के बावजूद, इसके बाद के वर्षों में स्कूलों में उपस्थिति कम हो रही है। मंत्री जयंत चौधरी ने स्पष्ट किया कि सरकार इन कारणों की पहचान कर रही है और माध्यमिक स्तर पर नामांकन बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, 8 प्रतिशत का यह आंकड़ा बताता है कि जमीनी स्तर पर अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह खबर विशेष महत्व रखती है। प्रवासी भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा से तरक्की का सबसे बड़ा माध्यम माना गया है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के छात्र शैक्षणिक क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में छात्राओं का स्कूल छोड़ना एक गहरी सामाजिक असमानता को दर्शाता है। सामुदायिक नेताओं का मानना है कि भारत में शिक्षा के बुनियादी ढांचे में सुधार और सुरक्षा सुनिश्चित करना इस समस्या का समाधान हो सकता है।
स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारणों में स्कूलों की दूरी, छात्राओं के लिए अलग शौचालयों की कमी, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और कुछ क्षेत्रों में आज भी व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच को जिम्मेदार माना जा रहा है। इसके अलावा, कई परिवारों में आर्थिक तंगी के चलते लड़कियों की पढ़ाई के बजाय लड़कों की शिक्षा को प्राथमिकता दी जाती है। सरकार ने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और 'समग्र शिक्षा' जैसी योजनाओं के माध्यम से स्थिति सुधारने का दावा किया है, लेकिन 8 प्रतिशत की दर यह संकेत देती है कि इन योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाने की आवश्यकता है।
निष्कर्षतः, कक्षा 9 और 10 में छात्राओं का स्कूल छोड़ना केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह भारत के भविष्य की कार्यशक्ति और महिला सशक्तिकरण के लक्ष्यों पर भी प्रभाव डालता है। सरकार को अब उन विशिष्ट क्षेत्रों और समुदायों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जहां यह दर औसत से अधिक है, ताकि हर बेटी को उसकी पूरी क्षमता तक पहुंचने का अवसर मिल सके।
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