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एमबीए या प्लंबर: मुख्य आर्थिक सलाहकार के बयान ने छेड़ी नई बहस, क्या बदल रहा है रोजगार का नजरिया?

ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 04:55 pm
एमबीए या प्लंबर: मुख्य आर्थिक सलाहकार के बयान ने छेड़ी नई बहस, क्या बदल रहा है रोजगार का नजरिया?

क्या एक प्लंबर एक एमबीए डिग्री धारक से बेहतर कमा सकता है? भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार के बयान ने शिक्षा और हुनर के बीच संतुलन पर एक नई चर्चा शुरू कर दी है।

भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन के एक हालिया बयान ने देश के युवाओं और शिक्षा जगत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। नागेश्वरन ने संकेत दिया कि वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में, एक कुशल प्लंबर या तकनीशियन बनना एक औसत दर्जे की एमबीए डिग्री हासिल करने से कहीं अधिक फायदेमंद हो सकता है। उनके इस दावे ने न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में रह रहे भारतीय समुदाय के बीच भी रोजगार के बदलते स्वरूप पर चर्चा छेड़ दी है। मुख्य आर्थिक सलाहकार का तर्क है कि भारत में डिग्री हासिल करने की होड़ ने 'डिग्री इन्फ्लेशन' (डिग्री की अधिकता) पैदा कर दी है, जहां शिक्षा की गुणवत्ता और बाजार की जरूरतों के बीच एक बड़ा अंतर है। उन्होंने सुझाव दिया कि हर किसी को प्रबंधन की डिग्री के पीछे भागने के बजाय उन व्यावसायिक कौशलों (Vocational Skills) पर ध्यान देना चाहिए जिनकी बाजार में वास्तविक मांग है। नागेश्वरन के अनुसार, एक कुशल कामगार न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकता है, बल्कि वह देश की अर्थव्यवस्था में भी ठोस योगदान देता है। सोशल मीडिया पर इस बयान को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जहां एक वर्ग इसे 'गरिमापूर्ण श्रम' (Dignity of Labour) की ओर एक सही कदम मान रहा है, वहीं आलोचकों का कहना है कि यह सरकार द्वारा पर्याप्त नौकरियां पैदा न कर पाने की विफलता को छिपाने का एक तरीका है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली अक्सर सैद्धांतिक ज्ञान पर अधिक जोर देती है, जिससे स्नातक होने के बाद भी युवा रोजगार के योग्य नहीं बन पाते। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह बहस विशेष रूप से प्रासंगिक है। ऑस्ट्रेलिया में 'ट्रेड्स' (Trades) यानी प्लंबिंग, इलेक्ट्रिशियन, कारपेंट्री और निर्माण कार्यों को उच्च सम्मान और भारी पारिश्रमिक दिया जाता है। वहां एक कुशल प्लंबर की आय अक्सर कई कॉरपोरेट पेशों के बराबर या उससे अधिक होती है। भारतीय छात्र जो अक्सर भारी कर्ज लेकर एमबीए करने ऑस्ट्रेलिया या अन्य देशों का रुख करते हैं, उन्हें वहां की जमीनी हकीकत देखकर अक्सर अपने करियर विकल्पों पर पुनर्विचार करना पड़ता है। ऑस्ट्रेलियाई श्रम बाजार में व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण (VET) की भारी मांग है। वहां की सरकार और उद्योग जगत लगातार ऐसे प्रवासियों की तलाश में रहते हैं जिनके पास व्यावहारिक हुनर हो। नागेश्वरन का बयान इस वैश्विक वास्तविकता की ओर इशारा करता है कि भविष्य का बाजार केवल कागजी डिग्रियों पर नहीं, बल्कि वास्तविक कौशल और समस्या-समाधान की क्षमता पर आधारित होगा। निष्कर्षतः, मुख्य आर्थिक सलाहकार का यह बयान हमें शिक्षा और रोजगार के पारंपरिक नजरिए को बदलने का संदेश देता है। चाहे भारत हो या ऑस्ट्रेलिया, अब समय आ गया है कि समाज व्यावसायिक कौशल को कमतर आंकना बंद करे और तकनीकी शिक्षा को मुख्यधारा के करियर विकल्प के रूप में स्वीकार करे।
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