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वैज्ञानिकों के लिए मध्य प्रदेश बन रहा इंसान-वन्यजीव सहअस्तित्व की प्रयोगशाला!

ICN24 Newsroom 7 जुल॰ 2026, 01:31 pm
वैज्ञानिकों के लिए मध्य प्रदेश बन रहा इंसान-वन्यजीव सहअस्तित्व की प्रयोगशाला!

मध्य प्रदेश अब केवल बाघों और चीतों का घर नहीं, बल्कि मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व का एक वैश्विक मॉडल बनने की राह पर है।

मध्य प्रदेश, जिसे भारत के 'हृदय प्रदेश' के रूप में जाना जाता है, अब वन्यजीव संरक्षण के एक नए और जटिल दौर से गुजर रहा है। यह राज्य केवल बाघों (Tiger State) और हाल ही में आए चीतों (Cheetah State) के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां तेंदुआ, भेड़िया और गिद्धों की भी घनी आबादी है। वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों के लिए अब यह राज्य एक ऐसी 'प्रयोगशाला' बन गया है, जहां इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष और उनके साथ रहने (Coexistence) की संभावनाओं पर शोध किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में ऐतिहासिक रूप से समृद्ध वन क्षेत्र और पुराने वन्यजीव गलियारे (Corridors) मौजूद हैं, जो जानवरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करते रहे हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में स्थिति बदली है। बढ़ते शहरीकरण, सड़क विस्तार और कृषि भूमि के फैलाव के कारण ये प्राकृतिक गलियारे टूट रहे हैं। इसका सीधा परिणाम मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते आमने-सामने के टकराव के रूप में सामने आ रहा है। राज्य के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह विकास की गति को बनाए रखते हुए अपने वन्यजीवों के लिए इन सुरक्षित रास्तों को कैसे बचाता है। यदि मध्य प्रदेश इन गलियारों को संरक्षित करने में सफल रहता है, तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए सहअस्तित्व का एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जंगलों को बचाना काफी नहीं है। वन्यजीवों की आवाजाही के लिए 'कनेक्टिविटी' सबसे महत्वपूर्ण है। जब बाघ या तेंदुआ एक जंगल से दूसरे जंगल जाने की कोशिश करते हैं और उन्हें बीच में बस्तियां या हाईवे मिलते हैं, तब संघर्ष की स्थिति पैदा होती है। ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह खबर विशेष महत्व रखती है, क्योंकि प्रवासी भारतीय अक्सर मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ या कान्हा जैसे राष्ट्रीय उद्यानों में ईको-टूरिज्म के लिए आते हैं। वन्यजीवों का संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उन समुदायों की सुरक्षा और आजीविका से भी जुड़ा है जो इन जंगलों के किनारे बसते हैं। आने वाले समय में मध्य प्रदेश की परीक्षा की घड़ी होगी। राज्य सरकार और वन विभाग को तकनीकी नवाचारों, जैसे कि ओवरपास और अंडरपास के निर्माण और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। यदि सहअस्तित्व की यह प्रयोगशाला सफल रही, तो मध्य प्रदेश भविष्य की पीढ़ियों को यह सिखा सकेगा कि कैसे प्रकृति और प्रगति एक साथ चल सकते हैं। वैज्ञानिकों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या यह राज्य अपनी जैव-विविधता को आधुनिक भारत की जरूरतों के साथ तालमेल बिठाने में सफल हो पाएगा या नहीं।
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