राजनीति
कर्नाटक विधान परिषद चुनाव: कांग्रेस ने जीतीं 7 में से 5 सीटें, भाजपा-जेडीएस गठबंधन में क्रॉस-वोटिंग से मची खलबली
ICN24 Newsroom 20 जून 2026, 02:34 am

कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस ने सात में से पांच सीटों पर कब्जा जमा लिया है, जबकि भाजपा-जेडीएस गठबंधन को क्रॉस-वोटिंग के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने अपनी ताकत का लोहा मनवाया है। हाल ही में संपन्न हुए विधान परिषद (MLC) के चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। सात सीटों के लिए हुए इस चुनाव में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 5 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी जेडीएस (JD-S) के हाथ केवल एक-एक सीट ही लगी है। यह परिणाम न केवल कांग्रेस के लिए एक बड़ी जीत है, बल्कि यह विपक्षी गठबंधन के भीतर गहरी दरारों को भी उजागर करता है।
चुनाव के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात भाजपा और जेडीएस विधायकों द्वारा की गई 'क्रॉस-वोटिंग' रही। खबरों के अनुसार, विपक्षी खेमे के कई विधायकों ने अपनी पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया। इस घटनाक्रम ने एनडीए (NDA) गठबंधन के भीतर नेतृत्व और अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस जीत को सरकार की नीतियों और जनता के भरोसे की जीत बताया है। डी.के. शिवकुमार, जिन्हें कर्नाटक की राजनीति का 'संकटमोचक' माना जाता है, इस चुनावी रणनीति के मुख्य सूत्रधार के रूप में उभरे हैं।
भाजपा के लिए यह परिणाम एक बड़े झटके के समान है। पार्टी नेतृत्व ने अब उन विधायकों की पहचान शुरू कर दी है जिन्होंने गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया। सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई से इस विफलता पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। जेडीएस के लिए भी स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि गठबंधन के बावजूद वह अपने आधार को बचाने में संघर्ष कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह क्रॉस-वोटिंग आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और राज्य की भविष्य की राजनीति पर गहरा असर डाल सकती है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय, विशेषकर कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले 'कन्नडिगा' प्रवासियों के लिए यह खबर काफी महत्वपूर्ण है। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई अक्सर अपने गृह राज्य की राजनीतिक स्थिरता और विकास कार्यों पर करीब से नजर रखते हैं। कर्नाटक के आईटी और स्टार्टअप इकोसिस्टम में निवेश करने वाले प्रवासी भारतीयों के लिए राज्य की राजनीतिक दिशा व्यापारिक दृष्टिकोण से भी मायने रखती है। बेंगलुरु की वैश्विक छवि और निवेश के माहौल पर इस तरह के चुनावी परिणाम मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं।
अंततः, यह जीत कांग्रेस के मनोबल को बढ़ाने वाली है, जो पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियों का सामना कर रही है। कर्नाटक की इस जीत ने यह संदेश दिया है कि यदि जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत हो और रणनीति सटीक हो, तो सत्ता विरोधी लहर या मजबूत गठबंधन को भी मात दी जा सकती है। अब देखना यह होगा कि भाजपा अपनी आंतरिक कलह को कैसे दूर करती है और आने वाले समय में कर्नाटक की राजनीति क्या नया मोड़ लेती है।
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