लाइव
राजनीति
राजनीति

चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर गहराता संकट? पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी की नई पुस्तक 16 जुलाई को होगी रिलीज

ICN24 Newsroom 13 जुल॰ 2026, 07:31 am
चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर गहराता संकट? पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी की नई पुस्तक 16 जुलाई को होगी रिलीज

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी की आगामी पुस्तक भारतीय निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

भारतीय लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ, निर्वाचन आयोग (ECI) की निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर बहस तेज होने वाली है। भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) डॉ. एस. वाई. कुरैशी की नई पुस्तक 16 जुलाई 2026 को रिलीज होने जा रही है, जो आयोग के कामकाज और उसकी स्वायत्तता पर 'आईना' दिखाने का दावा करती है। यह पुस्तक ऐसे समय में आ रही है जब भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर बसे भारतीय समुदाय के बीच भी चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर गहन चर्चाएं छिड़ी हुई हैं। इस पुस्तक के केंद्र में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का वह ऐतिहासिक कथन है, जिसमें उन्होंने निर्वाचन आयोग को 'लोकतंत्र की आत्मा' करार दिया था। डॉ. सिंह ने चेतावनी दी थी कि यदि हमने इस संस्था की निष्पक्षता खो दी, तो हम लोकतंत्र के रूप में सब कुछ खो देंगे। डॉ. कुरैशी ने अपनी इस कृति में उन घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया है जो वर्तमान दौर में आयोग की साख पर सवालिया निशान लगाती हैं। लेखक ने यह पड़ताल करने की कोशिश की है कि आखिर आज आयोग की तटस्थता पर उठने वाले सवालों से सत्ता पक्ष और प्रशासनिक ढांचा बेअसर क्यों बना हुआ है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय प्रवासियों (NRI) के लिए यह विषय विशेष महत्व रखता है। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई नागरिक भारत के चुनावी घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखते हैं। ऑस्ट्रेलिया में 'वीईसी' (विक्टोरियन इलेक्टोरल कमीशन) जैसी संस्थाओं की कार्यप्रणाली को देखने वाले प्रवासी अक्सर भारतीय निर्वाचन आयोग की तुलना वैश्विक मानकों से करते हैं। डॉ. कुरैशी की पुस्तक उन संवैधानिक चुनौतियों को उजागर करती है, जो भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे विदेशों में भारत की छवि पर भी असर पड़ता है। पुस्तक में उन विशेष प्रसंगों को भी शामिल किया गया है जहाँ चुनाव आयोग ने अतीत में अपनी रीढ़ का परिचय दिया था, और उनकी तुलना वर्तमान परिस्थितियों से की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह पुस्तक केवल चुनावी प्रक्रियाओं का संकलन नहीं है, बल्कि यह एक अलार्म की तरह है जो नागरिकों को संस्थागत क्षरण के प्रति सचेत करती है। 16 जुलाई को इसके विमोचन के बाद राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा वैचारिक 'धमाका' होने की संभावना है, जो भविष्य के चुनावी सुधारों की दिशा तय कर सकता है। अंततः, यह पुस्तक केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगी। जिस तरह से प्रवासी भारतीय समुदाय अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है, डॉ. कुरैशी के खुलासे और उनके सुझाव निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चर्चा का विषय बनेंगे। भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसकी संस्थाओं की स्वतंत्रता में निहित है, और यह पुस्तक उसी स्वतंत्रता को पुनर्स्थापित करने की एक बौद्धिक कोशिश है।
शेयर:

संबंधित ख़बरें

भदोही: बिजली का नामोनिशान नहीं पर बिलों की बरसात, आक्रोशित ग्रामीणों ने विभाग के खिलाफ किया प्रदर्शन
राजनीति

भदोही: बिजली का नामोनिशान नहीं पर बिलों की बरसात, आक्रोशित ग्रामीणों ने विभाग के खिलाफ किया प्रदर्शन

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में बिजली विभाग की बड़ी लापरवाही के खिलाफ ग्रामीणों ने मोर्चा खोल दिया है, जहां बिना बिजली कनेक्शन के ही हजारों के बिल भेजे जा रहे हैं।

13 जुल॰ 2026, 08:31 am
अयोध्या और जन-विश्वास की कसौटी: संस्थागत जवाबदेही का नया अध्याय
राजनीति

अयोध्या और जन-विश्वास की कसौटी: संस्थागत जवाबदेही का नया अध्याय

अयोध्या की गरिमा केवल इसके ऐतिहासिक महत्व में नहीं, बल्कि प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही में निहित है, जो भविष्य के जन-विश्वास को निर्धारित करेगी।

13 जुल॰ 2026, 06:31 am
चुनाव आयोग का बड़ा फैसला: अब नए मतदाता पंजीकरण के लिए माता-पिता के 'एसआईआर' विवरण देना होगा अनिवार्य
राजनीति

चुनाव आयोग का बड़ा फैसला: अब नए मतदाता पंजीकरण के लिए माता-पिता के 'एसआईआर' विवरण देना होगा अनिवार्य

भारत निर्वाचन आयोग ने नए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 में माता-पिता या दादा-दादी के एसआईआर विवरण देना अनिवार्य कर दिया है, जिससे सत्यापन प्रक्रिया में सुधार होगा।

13 जुल॰ 2026, 05:31 am