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मदनवाड़ा नक्सल हमले की 17वीं बरसी: शहीद SP विनोद चौबे और 29 जवानों के सर्वोच्च बलिदान को किया गया नमन
ICN24 Newsroom 12 जुल॰ 2026, 11:31 pm

छत्तीसगढ़ के मदनवाड़ा में 2009 के भीषण नक्सली हमले की 17वीं बरसी पर शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी गई। इस हमले में SP विनोद चौबे समेत 29 जवान शहीद हुए थे।
आज से ठीक 17 साल पहले, 12 जुलाई 2009 को छत्तीसगढ़ के तत्कालीन राजनांदगांव जिले (अब मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी) के मदनवाड़ा में एक ऐसा खूनी मंजर देखने को मिला था, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। आज इस कायराना नक्सली हमले की 17वीं बरसी है। इस अवसर पर शहीद स्मारक और जिला मुख्यालयों पर आयोजित कार्यक्रमों में शहीद पुलिस अधीक्षक (SP) विनोद कुमार चौबे सहित उन सभी 29 वीर जवानों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।
12 जुलाई 2009 की सुबह पुलिस को सूचना मिली थी कि नक्सलियों ने मदनवाड़ा के पास हमला किया है। सूचना मिलते ही राजनांदगांव के तत्कालीन एसपी विनोद कुमार चौबे अपनी टीम के साथ मौके के लिए रवाना हुए। जब पुलिस बल मदनवाड़ा के जंगलों में पहुंचा, तो घात लगाए बैठे सैकड़ों नक्सलियों ने चारों तरफ से अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। यह हमला इतना भीषण था कि जवानों को संभलने का मौका भी नहीं मिला। एसपी विनोद चौबे ने बहादुरी से मोर्चा संभाला और अंतिम सांस तक लड़ते रहे। इस मुठभेड़ में छत्तीसगढ़ पुलिस ने अपने एक काबिल आईपीएस अधिकारी और 28 अन्य जांबाज सिपाहियों को खो दिया।
विनोद कुमार चौबे छत्तीसगढ़ के पहले ऐसे आईपीएस अधिकारी थे जो नक्सल मोर्चे पर लड़ते हुए शहीद हुए। उनकी अदम्य वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत सरकार द्वारा शांतिकाल के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार 'कीर्ति चक्र' से सम्मानित किया गया था। आज भी मदनवाड़ा का वह जंगल उन शहीदों की वीरता और नक्सलियों की बर्बरता की गवाही देता है। इस हमले के बाद सुरक्षा बलों की रणनीति में व्यापक बदलाव आए और नक्सल विरोधी अभियानों को और अधिक संगठित किया गया।
बरसी के मौके पर आयोजित सभाओं में वक्ताओं ने कहा कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। बीते 17 वर्षों में छत्तीसगढ़ के इन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। नए जिले मोहला-मानपुर के गठन के बाद प्रशासन और पुलिस की पहुंच अंदरूनी गांवों तक बढ़ी है। हालांकि, मदनवाड़ा की वह घटना आज भी उन परिवारों के लिए एक कभी न भरने वाला जख्म है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है।
भारत से हजारों मील दूर ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी ऐसी खबरें अत्यंत संवेदनशील होती हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले प्रवासी भारतीय, विशेषकर जो छत्तीसगढ़ और मध्य भारत से ताल्लुक रखते हैं, वे अक्सर भारत की आंतरिक सुरक्षा और जवानों के संघर्ष को करीब से देखते हैं। आईजीपी और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने शहीदों के परिजनों से मुलाकात कर उन्हें हर संभव सहायता का आश्वासन दिया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की आंतरिक शांति बनाए रखने के लिए हमारे जवान किन कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी करते हैं।
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