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सुप्रीम कोर्ट में हंगामा: कागज फेंकने और गाली-गलौज के बावजूद जस्टिस सूर्यकांत ने क्यों नहीं की कार्रवाई? जानिए बड़ी वजह
ICN24 Newsroom 11 जुल॰ 2026, 04:31 pm

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता द्वारा कागज फेंकने और अभद्र भाषा का प्रयोग करने के बावजूद जस्टिस सूर्यकांत ने कोई दंडात्मक कार्रवाई करने से इनकार कर दिया है।
भारत के उच्चतम न्यायालय में हाल ही में एक ऐसी घटना घटी जिसने न्यायिक गरिमा और धैर्य की नई मिसाल पेश की है। सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता ने न केवल हंगामा किया, बल्कि न्यायाधीशों की ओर कागज फेंके और अभद्र भाषा का प्रयोग भी किया। इस गंभीर दुर्व्यवहार के बावजूद, जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस व्यक्ति के खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक या अवमानना की कार्रवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत का मानना है कि ऐसे कृत्य अक्सर केवल 'सस्ती लोकप्रियता' (Cheap Publicity) हासिल करने के उद्देश्य से किए जाते हैं।
मामले की विस्तार से जानकारी देते हुए बता दें कि सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता को लगा कि फैसला उसके पक्ष में नहीं जा रहा है, तो उसने आपा खो दिया। उसने बेंच के सामने कागजों का बंडल उछाला और आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। आमतौर पर, सुप्रीम कोर्ट के भीतर इस तरह का व्यवहार 'कोर्ट की अवमानना' (Contempt of Court) की श्रेणी में आता है, जिसमें जेल या भारी जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि, जस्टिस सूर्यकांत ने स्थिति को बड़ी परिपक्वता से संभाला। उन्होंने टिप्पणी की कि यदि अदालत इस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो वह अपने उस मकसद में सफल हो जाएगा जिसके लिए उसने यह ड्रामा किया है।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो केवल सुर्खियों में आने के लिए अदालती कार्यवाही में बाधा डालते हैं। अगर उन्हें दंडित किया जाता है या उन पर मामला दर्ज होता है, तो उन्हें वह मीडिया कवरेज और अटेंशन मिल जाता है जिसकी वे तलाश कर रहे होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक समय बहुत कीमती है और ऐसे नकारात्मक तत्वों को महत्व देकर सिस्टम का समय और ऊर्जा बर्बाद नहीं की जानी चाहिए। यह निर्णय दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका अब केवल दंड देने पर नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक तरीके से अनुचित व्यवहार को हतोत्साहित करने पर भी ध्यान दे रही है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की कानूनी प्रणाली में बढ़ते संयम और व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाती है। भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्रवासी अक्सर भारत में कानूनी सुधारों और अदालती शिष्टाचार पर करीब से नजर रखते हैं। ऑस्ट्रेलिया की अदालतों में भी 'डेकोरम' यानी शिष्टाचार को सर्वोपरि माना जाता है, और भारत के सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संदेश भेजता है कि न्याय का मंदिर केवल कानून से नहीं, बल्कि विवेक और धैर्य से चलता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो न्यायपालिका को डराने या सनसनी पैदा करने की कोशिश करते हैं। अदालत ने यह साफ कर दिया है कि वह किसी भी ऐसे कृत्य को नजरअंदाज कर सकती है जो केवल ध्यान खींचने के लिए किया गया हो। यह निर्णय न्यायिक इतिहास में इस बात के लिए याद रखा जाएगा कि कभी-कभी चुप्पी और 'नो एक्शन' (कोई कार्रवाई न करना) भी सबसे बड़ा दंड हो सकता है, क्योंकि यह अपराधी को वह प्रसिद्धि नहीं मिलने देता जिसकी उसने उम्मीद की थी।
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