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जवाहर कला केंद्र में सजीव हुई विभाजन की त्रासदी, कैनवास पर कलाकारों ने उकेरी विस्थापन की पीड़ा
ICN24 Newsroom 11 अग॰ 2026, 09:37 pm

जयपुर के जवाहर कला केंद्र में तीन दिवसीय कार्यशाला के माध्यम से कलाकार 1947 के विभाजन के दर्द को चित्रों में ढाल रहे हैं, जो हमारी साझा विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत की आजादी के 78वें वर्ष के उपलक्ष्य में जहां पूरा देश जश्न की तैयारियों में डूबा है, वहीं 1947 के विभाजन की गहरी टीस को भी कला के माध्यम से याद किया जा रहा है। राजस्थान की राजधानी जयपुर के प्रतिष्ठित जवाहर कला केंद्र (JKK) में इन दिनों एक विशेष चित्रकला कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। कला, साहित्य, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा आयोजित इस तीन दिवसीय कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को विभाजन की विभीषिका और उस दौरान लाखों लोगों द्वारा झेले गए संताप से अवगत कराना है।
10 से 12 अगस्त तक चलने वाली इस कार्यशाला में राजस्थान के वरिष्ठ कलाकारों के साथ-साथ युवा प्रतिभाएं भी अपनी तूलिका के जरिए इतिहास के उस काले पन्ने को सजीव कर रही हैं। कैनवास पर उभरते रंग केवल चित्र मात्र नहीं हैं, बल्कि वे उस दौर के विस्थापन, अपनों से बिछड़ने के गम और अनिश्चित भविष्य के डर की दास्तां बयां कर रहे हैं। कलाकारों ने विभाजन के समय हुए पलायन, रेलवे स्टेशनों पर उमड़ी भीड़ और उजड़े हुए घरों के दृश्यों को बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है।
ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी यह आयोजन विशेष महत्व रखता है। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रह रहे अनेक भारतीय परिवारों की जड़ें अविभाजित भारत से जुड़ी हैं। कई प्रवासियों के पूर्वजों ने उस त्रासदी को करीब से देखा और झेला है। कला के माध्यम से इतिहास का यह पुनरावलोकन प्रवासियों को अपनी जड़ों और उन संघर्षों की याद दिलाता है, जिन्होंने आज के आधुनिक भारत और उसके वैश्विक समुदाय की नींव रखी है। सिडनी में रहने वाले सांस्कृतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के आयोजन ऐतिहासिक घावों को भरने और संवाद स्थापित करने में सहायक होते हैं।
कार्यशाला के दौरान वरिष्ठ कलाकारों ने युवा चित्रकारों का मार्गदर्शन किया, जिससे कला की विभिन्न शैलियों का अनूठा संगम देखने को मिला। कुछ चित्रों में प्रतीकात्मक रूप से टूटी हुई कटीली तारों को दिखाया गया है, जो न केवल सीमाओं के बंटवारे को बल्कि मानवीय रिश्तों के विखंडन को भी दर्शाती हैं। वहीं, कुछ कृतियों में आशा की एक किरण भी दिखाई देती है, जो उस कठिन समय में भी लोगों के बीच बची रही मानवीयता और जिजीविषा का प्रतीक है।
जवाहर कला केंद्र की इस पहल की सराहना करते हुए विभाग के अधिकारियों ने कहा कि 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के संदर्भ में यह आयोजन अत्यंत प्रासंगिक है। यह कार्यशाला न केवल एक कलात्मक गतिविधि है, बल्कि यह उन गुमनाम शहीदों और विस्थापितों को एक श्रद्धांजलि भी है, जिन्होंने अपना सब कुछ खोकर भी नए सिरे से जीवन की शुरुआत की। आगामी 14 अगस्त को इन चित्रों की प्रदर्शनी लगाए जाने की भी योजना है, ताकि आम जनमानस भी कलाकारों की इस मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति से रूबरू हो सके।
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