राजनीति
मजाक में बिछड़ा बच्चा 35 साल बाद लौटा: बचपन की एक 'उल्टी' आदत ने परिवार से मिलाया
ICN24 Newsroom 1 जुल॰ 2026, 06:11 am

चीन में 7 साल की उम्र में ट्रेन में गलती से चढ़कर लापता हुए एक मूक-बधिर व्यक्ति को उसकी बचपन की एक अनोखी आदत की मदद से 35 साल बाद अपना परिवार मिल गया।
कहा जाता है कि नियति के खेल निराले होते हैं, लेकिन कभी-कभी बचपन की एक छोटी सी आदत भी जीवन को एक नया मोड़ दे सकती है। चीन में एक ऐसा ही भावुक कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक मूक-बधिर व्यक्ति 35 साल बाद अपने परिवार से मिल पाया। यह पुनर्मिलन किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि इसके पीछे किसी आधुनिक तकनीक से ज्यादा उस व्यक्ति की बचपन की एक विशेष आदत का हाथ था।
करीब साढ़े तीन दशक पहले, 7 साल की उम्र में यह बच्चा खेल-खेल में एक ट्रेन में चढ़ गया था। मूक-बधिर होने के कारण वह किसी को अपनी पहचान या घर का पता नहीं बता सका। देखते ही देखते वह अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर पहुंच गया। उस समय के सीमित संसाधनों और संचार के अभाव में, उसका अपने परिवार से संपर्क पूरी तरह टूट गया। उसके माता-पिता ने सालों तक उसकी तलाश की, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी उम्मीदें धुंधली पड़ती गईं।
इस व्यक्ति के बचपन की एक अनोखी आदत थी—वह अपना नाम उल्टा (Mirror Writing) लिखा करता था। जब वह लापता हुआ और उसे एक अनाथालय या किसी अन्य स्थान पर ले जाया गया, तो उसने अपनी पहचान के तौर पर वही उल्टा नाम लिखा। वर्षों बाद, जब अधिकारियों और स्वयंसेवकों ने पुराने रिकॉर्ड्स की जांच शुरू की, तो उन्हें इस विशेष लेखन शैली ने चौंका दिया। यही वह सुराग था जिसने जांचकर्ताओं को उसके पैतृक गांव तक पहुँचाया।
चीन के इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है, विशेषकर उन समुदायों में जो अपनों से बिछड़ने का दर्द समझते हैं। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भी ऐसी कहानियाँ गहरे महत्व रखती हैं। कई प्रवासी परिवार जो अपनी जड़ों से दूर हैं, वे इस भावनात्मक जुड़ाव और पहचान की ताकत को महसूस कर सकते हैं। यह घटना याद दिलाती है कि बचपन की स्मृतियाँ और हमारी अनूठी पहचान कभी नहीं मिटती।
आधुनिक डीएनए तकनीक और गुमशुदा लोगों के लिए बनाए गए डिजिटल डेटाबेस ने भी इस पुनर्मिलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब अधिकारियों ने उसकी 'उल्टी लिखने' की आदत वाले रिकॉर्ड को लापता बच्चों की सूची से मिलाया, तो कड़ी से कड़ी जुड़ती चली गई। अंततः, जब 42 साल की उम्र में वह अपने बुजुर्ग माता-पिता से मिला, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।
यह कहानी न केवल एक परिवार के मिलन की है, बल्कि यह मूक-बधिर समुदाय के प्रति संवेदनशीलता और उनकी विशेष संचार शैलियों को समझने की आवश्यकता पर भी जोर देती है। यह साबित करता है कि अगर सही सुराग और दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो समय और दूरी के फासले भी कम किए जा सकते हैं।
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