राजनीति
बागेश्वर का कुली-बेगार आंदोलन: जब उत्तराखंड की हुंकार के आगे नतमस्तक हुई अंग्रेजी हुकूमत
ICN24 Newsroom 16 अग॰ 2026, 03:37 am

1921 में बागेश्वर की सरयू नदी के तट पर शुरू हुआ कुली-बेगार आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक गौरवशाली गाथा है, जिसने महात्मा गांधी को भी चकित कर दिया था।
भारत की स्वतंत्रता की कहानी केवल बड़े शहरों या प्रमुख नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार हिमालय की गोद में बसे छोटे-छोटे कस्बों और गांवों से भी जुड़े हैं। उत्तराखंड के बागेश्वर में हुआ 'कुली-बेगार आंदोलन' एक ऐसी ही ऐतिहासिक घटना है जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। साल 1921 में मकर संक्रांति के अवसर पर जब पूरा क्षेत्र उत्तरायणी मेले के रंग में रंगा था, तब बागेश्वर की धरती ने एक ऐसी अहिंसक क्रांति देखी, जिसने इतिहास बदल दिया।
कुली-बेगार प्रथा एक दमनकारी व्यवस्था थी जिसके तहत स्थानीय ग्रामीणों को ब्रिटिश अधिकारियों का सामान मुफ्त में ढोना पड़ता था। इसके बदले उन्हें न तो कोई पारिश्रमिक मिलता था और न ही भोजन की व्यवस्था होती थी। इस शोषण के खिलाफ लंबे समय से सुलग रहा आक्रोश 14 जनवरी 1921 को फूट पड़ा। 'कुमाऊं केसरी' बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत और चिरंजीलाल जैसे दूरदर्शी नेताओं के नेतृत्व में हजारों की संख्या में लोग सरयू नदी के तट पर एकत्रित हुए।
आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आया जब बागनाथ मंदिर के सामने लोगों ने शपथ ली कि वे अब आगे से बेगार नहीं करेंगे। विरोध के प्रतीक के रूप में, गांव के प्रधानों और पटवारियों के पास मौजूद बेगार से संबंधित आधिकारिक रजिस्टरों को सरयू की पवित्र धारा में प्रवाहित कर दिया गया। यह एक साहसी कदम था, क्योंकि सरकारी दस्तावेजों को नष्ट करना सीधे तौर पर राजद्रोह के समान था। हालांकि, जनता की एकजुटता और अहिंसक संकल्प के सामने अंग्रेज अधिकारी असहाय नजर आए।
इस आंदोलन की सफलता की गूंज देशव्यापी रही। महात्मा गांधी, जो अहिंसा के मार्ग पर चलकर स्वराज का सपना देख रहे थे, इस घटना से अत्यंत प्रभावित हुए। गांधीजी ने इसे 'रक्तहीन क्रांति' का नाम दिया। वर्ष 1929 में जब गांधी स्वयं बागेश्वर पहुंचे, तो उन्होंने इस भूमि की ऊर्जा और यहां के लोगों के जज्बे को सलाम किया। मोहन सिंह मेहता जैसे सेनानी, जो उत्तराखंड से जेल जाने वाले शुरुआती स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे, इस आंदोलन की रीढ़ बने रहे।
आज जब दुनिया भर में फैला भारतीय समुदाय, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले प्रवासी भारतीय, अपनी जड़ों की तलाश करते हैं, तो कुली-बेगार जैसे आंदोलन हमें हमारे पूर्वजों के संघर्ष और साहस की याद दिलाते हैं। मेलबर्न या सिडनी में रहने वाली नई पीढ़ी के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि कैसे हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों के साधारण लोगों ने बिना हथियार उठाए दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को झुकने पर मजबूर कर दिया था। यह इतिहास केवल उत्तराखंड का नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और एकता की जीत का प्रतीक है।
संबंधित ख़बरें

राजनीति
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने कर्नाटक के सीएम की तीखी आलोचना की; मुठभेड़ मामले में गरमाई दक्षिण भारत की राजनीति
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने कर्नाटक में हुई एक हालिया मुठभेड़ को लेकर डीके शिवकुमार सरकार पर निशाना साधा है, जिससे दो पड़ोसी राज्यों के बीच भाषाई और क्षेत्रीय राजनीति गरमा गई है।
17 अग॰ 2026, 06:37 am
राजनीति
वंदे मातरम् के अपमान का आरोप: नवगछिया में भाजपा और भाजयुमो का कैंडल मार्च, कांग्रेस से माफी की मांग
नवगछिया में भाजपा और भाजयुमो कार्यकर्ताओं ने 'वंदे मातरम्' के कथित अपमान के खिलाफ कैंडल मार्च निकाला और कांग्रेस नेतृत्व से माफी की मांग की।
17 अग॰ 2026, 05:37 am
राजनीति
इस्राइली मंत्री इतामार बेन-ग्विर के विवादित बयान से अंतरराष्ट्रीय आक्रोश: गाज़ा में प्रतिदिन '30-40 हत्याओं' की वकालत
इस्राइली राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने एक पूर्व बंधक से बातचीत के दौरान गाज़ा में हर रात 30-40 लोगों को मारने का सुझाव दिया है, जिसकी वैश्विक स्तर पर निंदा हो रही है।
17 अग॰ 2026, 04:37 am
