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21 तोपों की सलामी का इतिहास: जानें भारत के राष्ट्रीय पर्वों पर क्यों दी जाती है यह सैन्य सलामी?
ICN24 Newsroom 12 अग॰ 2026, 04:37 am

भारत के स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर दी जाने वाली 21 तोपों की सलामी केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च सैन्य सम्मान और संप्रभुता का प्रतीक है।
भारत के हर राष्ट्रीय पर्व, चाहे वह 15 अगस्त का स्वतंत्रता दिवस हो या 26 जनवरी का गणतंत्र दिवस, की सबसे गौरवशाली तस्वीरों में से एक है—लाल किले या कर्तव्य पथ पर गूंजती 21 तोपों की सलामी। जब देश का तिरंगा फहराया जाता है और राष्ट्रगान की धुन बजती है, तो तोपों की यह दहाड़ पूरे देश में देशभक्ति का संचार कर देती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह परंपरा कहां से शुरू हुई और आखिर 21 तोपें ही क्यों चुनी गईं?
ऐतिहासिक रूप से, तोपों की सलामी की परंपरा मध्यकालीन नौसैनिक प्रथाओं से जुड़ी है। पुराने समय में, जब कोई युद्धपोत किसी मित्र देश के बंदरगाह या विदेशी क्षेत्र में प्रवेश करता था, तो वह अपनी तोपों को दागकर यह संकेत देता था कि उसकी तोपें अब खाली हैं और उसका इरादा शांतिपूर्ण है। शुरुआत में जहाजों पर सात तोपें होती थीं, क्योंकि सात का अंक खगोलीय और धार्मिक रूप से शुभ माना जाता था। उस समय थल पर स्थित किले अधिक शक्तिशाली माने जाते थे, इसलिए जहाज की प्रत्येक एक तोप के जवाब में तट से तीन तोपें दागी जाती थीं। इस प्रकार, 7 गुणा 3 का गणित 21 बन गया, जो आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय मानक बन गया।
भारत में यह परंपरा ब्रिटिश काल के दौरान व्यवस्थित हुई। उस समय विभिन्न रियासतों के राजाओं और ब्रिटिश अधिकारियों के लिए सलामी की अलग-अलग श्रेणियां निर्धारित थीं। सर्वोच्च सम्मान के रूप में 101 तोपों की सलामी ब्रिटिश सम्राट के लिए आरक्षित थी, जबकि 21 तोपों की सलामी प्रमुख रियासतों के शासकों को दी जाती थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत ने इस परंपरा को अपनी संप्रभुता के प्रतीक के रूप में अपनाया। अब यह सर्वोच्च सम्मान भारत के राष्ट्रपति और राष्ट्रीय ध्वज के लिए सुरक्षित है।
दिलचस्प बात यह है कि ये सलामी केवल दिखाने के लिए नहीं होती, बल्कि इसके पीछे एक बेहद जटिल सैन्य प्रक्रिया होती है। भारत में इसके लिए विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के समय की '25-पाउंडर गन' का उपयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया राष्ट्रगान की अवधि के साथ सटीकता से मेल खानी चाहिए। जैसे ही राष्ट्रगान शुरू होता है, पहली सलामी दी जाती है, और ठीक 52 सेकंड बाद, जब राष्ट्रगान समाप्त होता है, 21वीं तोप का गोला दागा जाता है। यह समन्वय भारतीय सेना की अनुशासन और सटीकता का प्रमाण है।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए, 21 तोपों की यह गूंज केवल एक टीवी फुटेज नहीं है, बल्कि यह उनकी जड़ों से जुड़ाव का एक माध्यम है। सिडनी, मेलबर्न और पर्थ जैसे शहरों में रहने वाले प्रवासी भारतीय जब इन दृश्यों को देखते हैं, तो यह उन्हें भारत की ऐतिहासिक यात्रा और उसके लोकतांत्रिक मूल्यों की याद दिलाता है। यह सम्मान उस संघर्ष की याद दिलाता है जिसके बाद भारत ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाई। आज यह गौरवशाली परंपरा आधुनिक भारत की शक्ति और उसके गौरवशाली अतीत के बीच एक सेतु का काम करती है।
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