ऑस्ट्रेलिया
सीपीआर ट्रेनिंग में महिलाओं की अनदेखी: क्यों पुरुष डमी बन रहे हैं महिलाओं की मौत का कारण?
ICN24 Newsroom 10 अग॰ 2026, 06:37 pm

सीपीआर प्रशिक्षण में उपयोग होने वाले अधिकांश पुतले पुरुषों के शरीर पर आधारित होते हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में महिलाओं की मदद करने में लोगों को झिझक होती है।
चिकित्सा विज्ञान और आपातकालीन सेवाओं में निरंतर प्रगति के बावजूद, एक गंभीर लैंगिक असमानता आज भी महिलाओं की जान के लिए खतरा बनी हुई है। हालिया शोध और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनियों के अनुसार, कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) प्रशिक्षण में इस्तेमाल होने वाले डमी या पुतले अधिकांशतः पुरुष शरीर की बनावट के होते हैं। यह स्थिति न केवल प्रशिक्षण को अधूरा बनाती है, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर दिल का दौरा पड़ने की स्थिति में महिलाओं के जीवित रहने की संभावनाओं को भी कम कर देती है।
आंकड़े बताते हैं कि यदि किसी महिला को सार्वजनिक स्थान पर कार्डियक अरेस्ट होता है, तो उसे पुरुषों की तुलना में बाईस्टैंडर सीपीआर (पास खड़े लोगों द्वारा दी जाने वाली मदद) मिलने की संभावना बहुत कम होती है। इस हिचकिचाहट के पीछे सबसे बड़ा कारण वह प्रशिक्षण है जिसमें केवल सपाट छाती वाले पुरुष डमी का उपयोग किया जाता है। जब लोग वास्तविक जीवन में किसी महिला को संकट में देखते हैं, तो वे शारीरिक स्पर्श, कपड़ों को हटाने की आवश्यकता या अनजाने में चोट पहुँचाने के डर से पीछे हट जाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भारतीय संस्कृति में 'शालीनता' और 'मर्यादा' के गहरे सामाजिक संस्कार हैं। कई बार, विपरीत लिंग के व्यक्ति को छूने या उनके कपड़े व्यवस्थित करने की झिझक आपातकालीन स्थिति में भारी पड़ सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक हम प्रशिक्षण में महिला शरीर की बनावट वाले डमी का उपयोग नहीं करेंगे, तब तक यह सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक बाधा बनी रहेगी। सीपीआर का मुख्य उद्देश्य हृदय को फिर से पंप करना है, और इसमें लगने वाला समय ही जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर तय करता है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि प्रशिक्षण केंद्रों को अब महिला एनाटॉमी वाले पुतलों का समावेश करना चाहिए। कुछ संगठनों ने मौजूदा पुरुष डमी पर लगाने के लिए 'ब्रेस्ट अटैचमेंट' या 'मैनक्वीन ब्रा' विकसित की है ताकि प्रशिक्षुओं को यह समझ आ सके कि महिलाओं पर सीपीआर की प्रक्रिया कैसे भिन्न हो सकती है—या अधिक महत्वपूर्ण रूप से, यह कितनी समान है। लक्ष्य यह है कि बचावकर्ता के मन से यह डर निकाला जाए कि वे कुछ 'गलत' कर रहे हैं।
अंततः, जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई समुदाय के सदस्यों को यह समझना होगा कि आपात स्थिति में जीवन बचाना किसी भी सामाजिक संकोच से ऊपर है। यदि आप किसी महिला को बेहोश होते देखते हैं और उसकी धड़कन बंद है, तो तुरंत सीपीआर शुरू करना ही उसकी जान बचाने का एकमात्र तरीका है। चिकित्सा जगत अब इस दिशा में काम कर रहा है कि प्राथमिक चिकित्सा के उपकरण और प्रशिक्षण उतने ही विविध हों जितना कि हमारा समाज है, ताकि किसी की जान सिर्फ इसलिए न जाए क्योंकि मदद करने वाला व्यक्ति हिचकिचा गया था।
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