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कन्या भ्रूण हत्या पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: अल्ट्रासाउंड रिकॉर्ड में कमी कोई छोटी गलती नहीं, बल्कि गंभीर उल्लंघन

ICN24 Newsroom 14 जून 2026, 03:31 pm
कन्या भ्रूण हत्या पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: अल्ट्रासाउंड रिकॉर्ड में कमी कोई छोटी गलती नहीं, बल्कि गंभीर उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि अल्ट्रासाउंड रिकॉर्ड बनाए रखने में लापरवाही को तकनीकी गलती मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने कन्या भ्रूण हत्या को एक गंभीर सामाजिक बुराई करार देते हुए पूर्व-गर्भाधान और प्रसव-पूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) अधिनियम के तहत सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अल्ट्रासाउंड रिकॉर्ड और फॉर्म भरने में की गई लापरवाही कोई 'मामूली तकनीकी त्रुटि' नहीं है, बल्कि यह कानून का सीधा उल्लंघन है। न्यायालय ने एक डॉक्टर की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें रिकॉर्ड न रखने के आरोपों को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति ए.एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम का मुख्य उद्देश्य लिंग चयन को रोकना और देश में गिरते लिंगानुपात को सुधारना है। अदालत ने जोर देकर कहा कि यदि अल्ट्रासाउंड क्लीनिकों को रिकॉर्ड के रख-रखाव में ढील दी गई, तो यह कानून के मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर देगा। न्यायालय के अनुसार, उचित रिकॉर्ड ही वह एकमात्र जरिया है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि किसी भ्रूण के लिंग की जांच नहीं की गई है। अदालत ने कहा कि यह कानून केवल कागजी कार्रवाई के लिए नहीं है, बल्कि यह एक सुरक्षा कवच है जो मादा भ्रूण की रक्षा करता है। पीठ ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि रिकॉर्ड न भरना केवल एक लिपिकीय गलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन केंद्रों पर शिकंजा कसेगा जो गुप्त रूप से लिंग निर्धारण की गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं और पकड़े जाने पर प्रशासनिक त्रुटि का बहाना बनाते हैं। यह फैसला प्रवासी भारतीय समुदाय (NRI) के लिए भी विशेष महत्व रखता है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में रह रहे भारतीय समुदाय के बीच भी लिंग चयन के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि ऑस्ट्रेलिया में सख्त स्वास्थ्य कानून लागू हैं, लेकिन भारतीय मूल के परिवारों में सांस्कृतिक मान्यताओं के चलते आज भी इस विषय पर चर्चा होती रहती है। भारत में कानून के इस सख्त प्रवर्तन से वैश्विक स्तर पर यह संदेश जाता है कि भारतीय न्यायपालिका सामाजिक समानता और महिलाओं के अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि समाज में बेटों की चाहत और बेटियों के प्रति भेदभाव को खत्म करने के लिए सख्त कानूनी अनुपालन अनिवार्य है। यह कानून उन डॉक्टरों और रेडियोलॉजिस्टों के लिए एक चेतावनी है जो रिकॉर्ड के मिलान में लापरवाही बरतते हैं। अब सरकारी एजेंसियों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे क्लिनिकों के औचक निरीक्षण के दौरान दस्तावेजों की बारीकी से जांच करें और किसी भी कमी पाए जाने पर तुरंत दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करें।
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