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इंडो-पैसिफिक से 'पैसिफिक' की ओर: क्या भारत को अब रणनीतिक एकांत के लिए तैयार रहना चाहिए?

ICN24 Newsroom 21 जून 2026, 12:11 am
इंडो-पैसिफिक से 'पैसिफिक' की ओर: क्या भारत को अब रणनीतिक एकांत के लिए तैयार रहना चाहिए?

अमेरिका द्वारा 'इंडो-पैसिफिक' दृष्टि से पीछे हटने और 'पैसिफिक' पर ध्यान केंद्रित करने के संकेतों के बीच, भारत के लिए रणनीतिक स्वायत्तता की चुनौती बढ़ गई है।

नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच पिछले कुछ वर्षों में प्रगाढ़ हुए सामरिक संबंधों में अब एक नई हलचल देखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका धीरे-धीरे उस 'इंडो-पैसिफिक' अवधारणा से पीछे हट रहा है, जिसने भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा और राजनीति के केंद्र में रखा था। अब अमेरिका के 'पैसिफिक कमांड' की ओर वापस लौटने के संकेतों ने नई दिल्ली में रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच चिंता पैदा कर दी है। इंडो-पैसिफिक की अवधारणा ने भारत को एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित किया था, जो हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच एक सेतु का कार्य करता है। हालांकि, हालिया घटनाक्रमों से संकेत मिलता है कि अमेरिका अपनी प्राथमिकताओं को फिर से परिभाषित कर रहा है और उसका ध्यान अब मुख्य रूप से प्रशांत क्षेत्र तक सीमित हो सकता है। यदि ऐसा होता है, तो भारत को 'रणनीतिक एकांत' (Strategic Loneliness) का सामना करना पड़ सकता है, जहां उसे अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए पहले से अधिक आत्मनिर्भर होना होगा। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय समुदाय के लिए यह बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत और ऑस्ट्रेलिया 'क्वाड' (Quad) के माध्यम से एक-दूसरे के निकट आए हैं। यदि अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी सक्रियता कम करता है या अपनी परिभाषा बदलता है, तो कैनबरा और नई दिल्ली के बीच के रक्षा संबंधों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया के लिए हिंद महासागर का महत्व कम नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिका की प्राथमिकताओं में बदलाव क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ सकता है। विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत को अब केवल पश्चिमी देशों के समर्थन पर निर्भर रहने के बजाय अपनी समुद्री शक्ति और द्विपक्षीय गठबंधनों को मजबूत करने की आवश्यकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के संकटों के बीच अमेरिका का ध्यान कई मोर्चों पर बंटा हुआ है। ऐसे में, इंडो-पैसिफिक से भारत का 'अदृश्य' होना नई दिल्ली की विदेश नीति के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है। अंततः, भारत के लिए संदेश स्पष्ट है: वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखना ही एकमात्र विकल्प है। 'रणनीतिक एकांत' का अर्थ अकेलापन नहीं, बल्कि अपने हितों की रक्षा के लिए स्वयं को सक्षम बनाना है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इस नई वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका को कैसे फिर से परिभाषित करता है।
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